मंगलवार, 11 नवंबर 2014

वारिस

लघुकथा

हिंदी के  एक समर्पित साहित्यकार सूर्यकांतजी काफी बूढ़े  हो चुके थे। मौत को सन्निकट महसूस करके एक दिन वे  परिजनों को पास बुलाकर बोले  -'' अब मेरा भगवान के घर से कभी भी बुलावा आ सकता है। मैं चाहता हूं कि मेरे पास जो संपदा है, उसे तुम लोगों को दे दूं।''
यह सुनकर छोटे बेटे कविनंदन  को छोड़ कर बाकी बहू -बेटे खुश हो गए। वे तो काफी दिनों से पैतृक संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए थे। बेटे बंटवारे के लिए पिता से कई बार विवाद भी कर चुके थे। छोटा बेटा  इतना दुष्ट था कि पिता की पूरी संपत्ति खुद ही हड़प कर जाना चाहता था।
उस दिन पिता ने बंटवारे की बात की तो छोटा बेटा  कविनंदन भड़क उठा।  उसने कहा -'' पिताजी, आपकी सारी संपत्ति मेरी है। किसी को नहीं मिलेगी फूटी कौड़ी। अगर आपने मेरे अलावा किसी को कुछ दिया तो मैं आपकी जान ले लूंगा। ''
यह सुनना था कि बाकी के दो भाई शारदा प्रसाद  और कविभूषण, कविनंदन से विवाद करने लगे।  पिता ने किसी तरह विवाद शांत कराया।  इसके बाद वे  बोले  -'' देखो बच्चो, मेरे पास मां सरस्वती के प्रसाद के अलावा और कुछ भी नहीं है।  मैंने जीवनभर हिंदी की सेवा की है। मेरी ये किताबें ही मेरी संपत्ति हैं। जितना रुपया -पैसा था,  उसे मैंने हिंदी के प्रचार -प्रसार में लगा दिया। मेरी इच्छा है कि मेरा अधूरा रह गया हिंदी का सेवा -कार्य तुम तीनों भाई मिल -बांटकर करो।''
''भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा सेवा -कार्य। तुम पिता हो कि शत्रु ? मन करता है कि अभी तुम्हारा गला दबा दूं।'' छोटे बेटे कविनंदन ने कहा।
''ठीक कह रहा है कविनंदन। पिताजी,  हम सभी भाई घर से बाहर नौकरी करने चले गए तो  आपने सारी संपत्ति इस बेकार के काम में लगा दी। हम जा रहे हैं। आपकी कोई लाश उठाने वाला नहीं होगा। '' शारदा प्रसाद बोला।
''हां -हां, मैं भी जा रहा हूं। पिताजी आपके क्रिया -कर्म में भी नहीं आऊंगा।'' कविभूषण  ने कहा।
सब लोग जाने लगे, तभी छोटे बेटे  कविनंदन की चौदह वर्षीया बेटी सरस्वती ने  आगे बढ़कर सभी को रोका और कहा -'' दादाजी के अधूरे कार्य मैं पूरे करूंगी। मैं करूंगी हिंदी की सेवा। ------दादाजी, आप चिंता न करें। आपकी सभी किताबें सुरक्षित रहेंगी। मैं आजीवन हिंदी बोलूंगी, पढ़ूंगी, लिखूंगी और  इसका प्रचार -प्रसार करूंगी। आप अपनी संपदा की वारिस मुझे बनाइए।''
यह सुनकर सभी लोग सन्न रह गए। बूढ़े साहित्यकार उठकर पोती को कलेजे से चिपका लिए  और रोते हुए बोले -''वाह, बिटिया वाह। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।  तुम ही मेरी वारिस हो।  बाकी तो ये सभी नालायक  निकले। लालच ने इन्हें विवेक -शून्य बना दिया। मां के प्रसाद स्वरूप  इन हिंदी के ग्रंथों  को ठुकरा दिया, जिसकी रोटी खा रहे हैं। ----शर्म करो नालायको, तुम तीनों हिंदी का प्रचार -प्रसार करने वाले संस्थानों में अधिकारी हो----मैंने सोचा था ---''
साहित्यकार महोदय अपनी बात पूरी करने की कोशिश कर रहे  थे , तभी उन्हें  जानलेवा खांसी आई और कुछ देर में उन्होंने  हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।
-राजकुमार धर द्विवेदी

2 टिप्‍पणियां:

  1. साहित्यकार की असली पूंजी उनकी रचनाएं हैं, जिनसे पूरा समाज लाभान्वित होता है। लेकिन ऐसी संतानों का क्या? साहित्य के प्रति सूर्यकांत जी के अनुराग और समर्पण का प्रमाण ही है कि उन्होंने अपने बच्चों का नाम भी कविनंदन, कविभूषण और शारदा रखा, लेकिन वे नाम के ठीक विपरीत थे। हालांकि नातिन सरस्वती ने उनकी विरासत संभालने की बालसुलभ इच्छा जताई। बेटों की नालायकी का गहरा दु:ख और नातिन से जगी आशा के बीच सूर्यकांत जी के प्राण-पखेरू उड़ गए। राष्ट्रभाषा हिन्दी को समर्पित एक मार्मिक लघुकथा। गुरुजी को सादर नमन।

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