इस पर वे कहते -'नहीं। खाता मैं हूं तो गठरी कौन ढोए ? गठरी सिर पर रखने से मैं छोटा नहीं हो जाऊंगा। अपना काम है, कोई कुछ कहता रहे, इसमें लाज -शर्म कैसी ?' जब कोई रास्ते में मिल जाता और गठरी लेने लगता तो वे साफ मना कर देते।
जहां तक मुझे याद है। वे रीवा [मध्यप्रदेश ] के देवतालाब इलाके के रहने वाले थे। देवतालाब से हनुमना तक वाहन सुविधा थी। लेकिन मेरे गांव तक का सफर बहुत ही कठिन था। वे एक महीने का राशन घर से लाते थे। गांव के लोग उन्हें खाने पर बुलाते थे, लेकिन वे विनम्रता से मना कर देते थे। स्कूल में ही खाना बनाते और खाते थे। पढ़ाने -लिखाने में एक नंबर थे। कभी -कभी बच्चों को रात को भी बुलाकर पढ़ाया करते थे। नैतिक शिक्षा पर बहुत ही जोर देते थे। कहा करते -' किताबी कीड़ा मत बनो। शिक्षा का मतलब संस्कार भी है। संस्कार के बिना शिक्षा बेकार है। '
पढ़ाने -लिखाने के साथ ही वे स्कूल की मरम्मत भी किया करते थे। मजदूरों के साथ स्कूल की छवाई करते मैंने उन्हें कई बार देखा था। इसके अलावा गांव के झगड़े -टंटे भी ख़त्म कराया करते थे। गांव में उनका बड़ा मान था।
वे बड़े विनोदी भी थे। मेरा सामने का एक दूधिया दांत टूट गया था। उन्होंने देखा तो हंसते हुए कहा -'मां ने लोढ़ा मार दिया क्या रे ?'
आज शिक्षक दिवस पर उनकी बहुत याद आ रही है। वाकई ऐसे शिक्षक राष्ट्रपति पुरस्कार के हक़दार होते हैं। लेकिन आज के ज़माने में ऐसे शिक्षक दुर्लभ हैं। नमन गुरुदेव।
-राजकुमार धर द्विवेदी
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