शाम का समय था। मैं अपने शहर के गार्डन में
बैठा था। उसी दौरान सात -आठ किशोरियों का ग्रुप गुजरा। हमारे आसपास बैठे
लोगों ने किशोरियों की मस्ती देखकर प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। कई
बूढ़ों ने कहा -' देखो, इन लड़कियों को-------क्या ज़माना आ गया है। कोई लाज
-शर्म नहीं। ये फैशन ले डूबेगा। हमारे ज़माने में मान-मर्यादा का ख्याल रखा
जाता था। ' गार्डन की सुरक्षा में तैनात एक सिपाही ने बुजुर्गों की यह बात
सुनकर कहा -'ये अभी बच्चियां हैं। क्या इन्हें हंसने -बोलने, खुशी मनाने का
हक़ नहीं है ? क्या बुरा कर रही हैं ये ? अपने में मस्त हैं। आप सबको तो
खुश होना चाहिए इन्हें देखकर।' पुलिस से हम ऐसे नेक विचार की उम्मीद नहीं
करते। मुझे उस पुलिस जवान के मुंह से ऐसी बात सुनकर बहुत अच्छा लगा और उन
बुजुर्गों पर बेहद गुस्सा आया, जो सिर्फ अपने ज़माने का राग अलापते हुए
बेतुकी बातें कर रहे थे। हां, यह सच है कि बच्चों को अति छूट देने के कारण
वे बिगड़ गए हैं। कई तो सारी मर्यादाएं ही लांघ जाते हैं, लेकिन यह हम पर
निर्भर करता है कि उन्हें कितनी छूट दें और कितना उन पर नियंत्रण रखें।
बच्चों को ज्यादा दबाना भी ठीक नहीं और खुली छूट देना तो बहुत ही गलत है।
उन्हें खुली हवा में सांस लेने दें, तभी वे कुछ कर पाएंगे। ये जो बेड़ियां
हम लगाते हैं, उन्हें हर बात पर गलत साबित करते हैं, ऐसा करके हम अपनी नई
पौध की जड़ में खाद -पानी नहीं, बल्कि ज़हर डालते हैं। क्या ज़माना था पुराना ?
मैं ऐसे कई बुजुर्गों को देखता हूं , जो अपनी उम्र का लिहाज़ न करते हुए
बच्चियों तक को घूरते रहते हैं। ज़माना हमसे है , हम ज़माने से नहीं। बच्चों
को अच्छा माहौल दें, उनके दोस्त बनें, उनमें कमियां ही न निकालें, उनकी
अच्छाइयों को सराहें भी। कहीं कुछ बुरा देखें तो प्यार से समझाएं। इससे आप
नई पीढ़ी के बीच आदरणीय बने रहेंगे।
-राजकुमार धर द्विवेदी
-राजकुमार धर द्विवेदी
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