मंगलवार, 4 नवंबर 2014

एक थे हनफ़ी भाई

यादें
 
सतना [मध्यप्रदेश] में एक शायर थे - हनफ़ी भाई। पेशे से टेलर थे। उन दिनों मैं 'नेशनल टुडे न्यूज़' में काम करता था। हनफ़ी भाई मेरे पास आया करते थे। मैं उनकी शायरी बड़े ही सम्मान के साथ प्रकाशित किया करता था। वे हिन्दी कम जानते थे।  मैं रचना मांगता तो हंस कर कहते -'लो, लिख लो, राज भाई। आज ही एक ग़ज़ल कही है मैंने।' वे बोलते और मैं लिख लेता। इसके बाद वे उसे पढ़ते और कहीं कोई शब्द गलत लिखा होता तो उसकी ओर मेरा ध्यान आकृष्ट कराते। उनकी संगति में मैंने शायरी का 'ककहरा' सीखा था। उनका मंच -संचालन और काव्य -पाठ बेहद उम्दा था।  वे जिस मंच पर होते, वहां रौनक बनी रहती। अच्छे कवि -शायर को दिल खोलकर दाद देते, लेकिन अगर किसी ने शब्दों का गलत उच्चारण किया या शेखी बघारी तो उसे झाड़ने से भी बाज नहीं आते थे। यही कारण था कि कथित साहित्यकार उनसे छरकते थे और उनकी बेबुनियाद आलोचना किया करते थे।  लेकिन खुशदिल इंसान हनफ़ी भाई इसकी परवाह नहीं किया करते थे।
दो -चार दिन में वे मुझसे मिलने आ ही जाया करते थे। परिचय के शुरुआती दिनों में वे एक बार आए और बोले -'राज भाई, एक जरूरी काम है आपसे।'
यह सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं रुपया -पैसा तो नहीं मांगेंगे। क्योंकि कई कवि ऐसा कर चुके थे।  परिचय बढ़ाकर पैसा  मांगते थे और फिर दिया गया पैसा लौटाने का नाम नहीं लिया करते थे। लेकिन हनफ़ी भाई उन लोगों में नहीं थे। वे बड़े ही स्वाभिमानी थे। गरीबी में गुजारा कर लेते थे, लेकिन किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया करते थे।
हां तो मैं बता रहा था कि हनफ़ी भाई ने कहा कि एक जरूरी काम है।  मैंने काम पूछा तो बोले -'एक मुशायरे में चलना है। आज ही शाम को।'
 यह सुनकर मैं हंसा और बोला  -'मुशायरे में चलना है ? मैंने आपकी गंभीरता देखकर समझा कि कोई खास काम होगा।'
'तो आप भी साहित्य को खास काम नहीं मानते ?' उन्होंने मज़ाकिया लहजे में सवाल किया और बोलना जारी रखा -'मैंने दुमदारों को दूर रखा है और दमदारों को बुलाया है। ऐसे लोगों को, जो मंच को गरिमा प्रदान करें। लटके -झटके वाले और चुटकुलेबाज नहीं चलेंगे वहां। साहित्य-कर्म गंभीरता का ही विषय है।  बहुत सोच -समझकर लोगों को बुलाना पड़ता है। नाक का सवाल है। चुटकुलेबाजों ने मंच बिगाड़ कर दिया है। '
 मैं उस मंच पर गया।  वहां हनफ़ी भाई का हुनर देखा तो बेहद खुश हुआ।
साहित्य के प्रति उनका समर्पण अनुकरणीय था। श्रोताओं को बांधकर रखने की कला उनमें बखूबी थी। वे कहा करते -' लोग समय निकालकर हमें सुनने आते हैं। हम कुछ उम्दा पेश करें , ताकि वे खुश होकर जाएं, उन्हें कुछ अच्छा मिले। ऐसा करने से ही मंचों का वजूद बचा रहेगा। आज मंचों से जो अरुचि हो रही है,  उसके लिए  वे कवि -शायर दोषी हैं, जो कुछ भी सुनाए रहते हैं। चुटकुलेबाजो को आउट करना है। '
ऐसे शायर को हम सभी के बीच रहना था, लेकिन एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। उन्हें गुजरे हुए सालों बीत गए, लेकिन मुझे उनकी याद आती रहती है। कवि -शायर मित्रों से उनके साहित्य के प्रति अनुराग की चर्चा करते हुए मुझे सुखद अनुभूति होती है।
-राजकुमार धर द्विवेदी  

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