गुरुवार, 30 जून 2016

लघुकथा


वरदान
दो बालक माता सरस्वती से वरदान मांगने गए। मां ने एक बालक को वर देते हुए कहा, "तू बेहतर शिक्षा प्राप्त कर उच्चाधिकारी बनेगा।"
"और मैं, माता?" दूसरे बालक ने उतावली दिखाई।
" तू अल्प विद्या प्राप्त करेगा।"
"ऐसा क्यों माता? वर देने में भेदभाव क्यों?"
"बेटा, ब्रह्मा जी तेरा भाग्य पहले ही बहुत अच्छा लिख चुके हैं। तू नेता बनेगा। नेता को विद्या की नहीं, तिकड़म की जरूरत होती है। वह उसी से नाम और दाम पाता है। तू जब मंत्री बनेगा तो सारे आईएएस-आईपीएस तुम्हारे सामने सर झुकाए खड़े रहेंगे।" माता सरस्वती ने बालक के कान में यह बात कही तो वह खुशी से उछल पड़ा।
-राजकुमार धर द्विवेदी

लघुकथा


नामी साहित्यकार
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शाम का समय था। नामी साहित्यकार 'धूल' जी पान चबाते हुए अपनी गद्दी पर बैठे गपोड़ियों की राह देख रहे थे। तभी एक युवा लेखक आया और उनके क़दमों में लोट गया।
'' खुश रहो, खूब आगे बढ़ो। नाम रोशन करो। उठो और यह बताओ कि काम हुआ कुछ ?''
'' जी हां, दादा। दस शहरों में आपका कार्यक्रम फिट हो गया है। वहां आपका व्याख्यान और सम्मान होगा।''
'' बहुत खूब। और किताबों का क्या हुआ ?''
'' चार नए लोगों को पटा लिया है। हालांकि उनकी रचनाओं में कोई दम नहीं है, लेकिन उन्हें छापना है। आप बढ़िया भूमिका लिख दीजिएगा। माल अच्छा मिलेगा। दूं पांडुलिपि, देखेंगे ?''
'' नहीं। ससुरों का कचरा क्या देखूं मैं। तुम ही मेरे नाम से भूमिका लिख दो। ''
'' ठीक है।''
'' और कोई नया मुद्दा बताओ। असहिष्णुता के मुद्दे के बाद अखबारों में बहुत दिनों से नाम और फोटो नहीं आया मेरा। चार दिन नाम और फोटो न छपे तो बेचैनी होने लगती है। ये छपास का रोग भी साला -----''
-राजकुमार धर द्विवेदी