नामी साहित्यकार
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शाम का समय था। नामी साहित्यकार 'धूल' जी पान चबाते हुए अपनी गद्दी पर बैठे गपोड़ियों की राह देख रहे थे। तभी एक युवा लेखक आया और उनके क़दमों में लोट गया।
'' खुश रहो, खूब आगे बढ़ो। नाम रोशन करो। उठो और यह बताओ कि काम हुआ कुछ ?''
'' जी हां, दादा। दस शहरों में आपका कार्यक्रम फिट हो गया है। वहां आपका व्याख्यान और सम्मान होगा।''
'' बहुत खूब। और किताबों का क्या हुआ ?''
'' चार नए लोगों को पटा लिया है। हालांकि उनकी रचनाओं में कोई दम नहीं है, लेकिन उन्हें छापना है। आप बढ़िया भूमिका लिख दीजिएगा। माल अच्छा मिलेगा। दूं पांडुलिपि, देखेंगे ?''
'' नहीं। ससुरों का कचरा क्या देखूं मैं। तुम ही मेरे नाम से भूमिका लिख दो। ''
'' ठीक है।''
'' और कोई नया मुद्दा बताओ। असहिष्णुता के मुद्दे के बाद अखबारों में बहुत दिनों से नाम और फोटो नहीं आया मेरा। चार दिन नाम और फोटो न छपे तो बेचैनी होने लगती है। ये छपास का रोग भी साला
-राजकुमार धर द्विवेदी
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