लघुकथा
कबाड़ी के ठेले पर जाने- माने लेखक 'निर्गुण' जी का सद्यः प्रकाशित लघुकथा संग्रह 'मैं धूल हूं' देख कर उनके मित्र मोहन चकित रह गए। उन्होंने पुस्तक पलट कर देखी। लिखा था-'जाने-माने समालोचक और प्राध्यापक आदरणीय 'खूसट' जी को सादर भेंट।'
"भाई, तुम्हें यह किताब कहां मिली?"
"का पता कि कहां मिली? वैसे कई दिन से मंत्रियों और साहबों के बंगले से यह कबाड़ खूब निकल रहा है।"
-राजकुमार धर द्विवेदी
कबाड़ी के ठेले पर जाने- माने लेखक 'निर्गुण' जी का सद्यः प्रकाशित लघुकथा संग्रह 'मैं धूल हूं' देख कर उनके मित्र मोहन चकित रह गए। उन्होंने पुस्तक पलट कर देखी। लिखा था-'जाने-माने समालोचक और प्राध्यापक आदरणीय 'खूसट' जी को सादर भेंट।'
"भाई, तुम्हें यह किताब कहां मिली?"
"का पता कि कहां मिली? वैसे कई दिन से मंत्रियों और साहबों के बंगले से यह कबाड़ खूब निकल रहा है।"
-राजकुमार धर द्विवेदी
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