बुधवार, 28 दिसंबर 2022

जल अमृत-तुल्य, इसे बचाएं

 


जल अमृत-तुल्य, इसे बचाएं

         

                -राजकुमार धर द्विवेदी


गर्मी के दिन आने वाले हैं। इस मौसम में तमाम जलाभाव हो जाता है। बूंद-बूंद पानी के लिए लोग परेशान होते हैं। चौबीसों घंटे पानी की चिंता बनी रहती है।  लेकिन जो लोग दूरदर्शी होते हैं,  वे संकट आने के पूर्व ही सजग रहते हैं। इस तरह वे विषम स्थिति में खुद को उबार लेते हैं। संत रहीम ने बहुत पहले पानी के लिए सतर्क कर दिया था। उन्होंने लिखा- 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरें मोती, मानुष, चून।'' अगर संत से लोगों ने सीख ग्रहण की होती तो पानी के लिए इतनी परेशानी क्यों होती?


एक माह पूर्व की बात है। एक मित्र के यहां से गृह प्रवेश का निमंत्रण आया था। मैं सपरिवार मित्र के घर पहुंच गया। पूजा-पाठ, भोजन आदि करते हुए रात के नौ बज गए। घर पहुंच कर जब पीने के पानी के लिए बाल्टी देखी तो वह खाली थी। घर की चार बाल्टियों में से सिर्फ एक बाल्टी आधी भरी हुई ही। सुबह जाने की जल्दी में पानी भरना भूल गए थे तथा रात में जब तक घर आए, नल जा चुका था। चूंकि रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए पड़ोसियों के यहां भी पानी लेने नहीं जा सकते थे। अब तय यह हुआ कि आधी बाल्टी पानी से ही रात गुजारी जाए। इस भीषण गर्मी में आठ लोगों के लिए पानी पर्याप्त नहीं था, लेकिन इसके अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं था। 


इन आठ लोगों में से तीन मेरे मामा के लड़के थे, जो गर्मी की छुट्टियों में हमारे घर आए हुए थे। पानी पीते समय वे पीते कम और फेंकते ज्यादा थे। गांव में उनका खुद का बोर है। प्यास लगते ही बोर चालू कर पानी पीते और काफी मात्रा में पानी व्यर्थ बहा देते। लेकिन अब संकट के समय उन्हें एक-एक बूंद का महत्व समझते देखकर मेरी प्यास बुझ रही थी। 


मैंने उनसे पूछा, "क्या अब भी वापस जाकर पानी की बर्बादी करोगे?" 

वे एक स्वर में बोले, "आज की रात का सबक उन सभी संदेशों से बढ़कर है, जो हमने आज तक देखा, सुना या पढ़ा है। पानी की इस क्षणिक समस्या ने उस गंभीर भविष्य का बोध करा दिया, जिसके बारे में हम सभी जानते हैं, लेकिन जागरूक तथा सतर्क बहुत कम लोग हैं।"


सुरक्षित जल आपूर्ति एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था का आधार होती है, पर फिर भी दुर्भाग्यवश विश्व स्तर पर इसे प्रमुखता नहीं दी गई है। जब भी जल और वायु के बिना जीवन की बात होती है तो कहते हैं कि जल के बिना कुछ हफ्ते जीवित रह सकते हैं, लेकिन हवा के बिना सिर्फ कुछ मिनट। जल संकट दुनिया के देशों की प्राथमिकता में शुमार नहीं रहा। शायद यही कारण है कि हम ऐसे आसन्न संकट की ओर बढ़ रहे हैं, जो मानव अस्तित्व के लिए चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। 


पृथ्वी पर लगभग 71 प्रतिशत पानी है, लेकिन उसमें से भी केवल तीन प्रतिशत पीने योग्य है। एक अनुमान के अनुसार जल से होने वाले रोगों के लिए भारत पर प्रति वर्ष लगभग 42 अरब रुपये का आर्थिक बोझ है। भारत में 50 प्रतिशत से भी कम आबादी के पास पीने का सुरक्षित पानी उपलब्ध है। छत्तीसगढ़ के सुपेबेड़ा में फ्लोराइड और आर्सेनिक से दूषित जल के कारण लोग किडनी से संबंधित बीमारी के शिकार हो रहे हैं और असमय काल के ग्रास बन रहे हैं। 


अब मानसून आ चुका है। प्रकृति से हमें वर्षा के माध्यम से असीमित जल भंडार मिलेगा, जिसे अपने उपयोग के लिए ज्यादा से ज्यादा संचित करना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए जल शक्ति मंत्रालय ने 29 मार्च, 2022 से 30 नवंबर, 2022 की अवधि के लिए जल शक्ति अभियान: कैच द रेन अभियान 2022 प्रारंभ किया है। 


जल के मामले में हमें दूसरों की गलतियों से सीखना है, न कि खुद गलती करके। इस अमूल्य संपदा की हानि के परिणाम कितने विनाशकारी होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत विश्व के उन देशों में आता है, जो जल संकट का सामना कर रहे हैं। 'जल है तो कल है' इसके मायने समय के साथ और गम्भीर हुए हैं, इसलिए अब जल को देवता मानकर सारी जिम्मेदारी उन पर न डाल कर, जल को एक संसाधन के रूप में समझने की जरूरत है। जल का संरक्षण, संचयन और निरंतरता बनाए रखने के लिए सभी को आगे आना होगा।


-राजकुमार धर द्विवेदी

एफ-8, आनंद विहार, प्राकृतिक चिकित्सालय के पास, आनंद नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)। पिनकोड-492001

रविवार, 11 मार्च 2018

संस्मरण


संगीत की मघुर स्वर लहरी और वह साधु
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सालों पहले की बात है। तब मैं मध्यप्रदेश के मंडला जिला मुख्यालय में पत्रकारिता करता था। शाम को अक्सर माता नर्मदा की आरती में शामिल होने रपटा घाट जाया करता था। एक दिन कुछ जल्दी पहुंच गया। कानों में संगीत की मधुर स्वर लहरियां सुनाई दीं। मैं खिंचता चला गया। मंदिर में एक युवा साधु
इकतारा बजा रहा था। मैं चुपचाप उसके पास बैठकर संगीत का आनंद लेने लगा। उसकी आंखें बंद थीं। वह भाव में खोया हुआ था। कुछ देर बाद उसने वादन ख़त्म किया तो मैंने  उसकी तारीफ की। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो उसने बड़ी निराशा की बात की। वह बोला -'जीवन में बड़ा दुख है। यह संसार ही दुख का सागर है। सोचता हूं कि कहां आकर फंस गया ? जल्दी मुक्ति मिले। ' यह सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि इतना कर्णप्रिय संगीत सुनाने वाला आदमी ऐसा विचार कैसे रख सकता है ? इस संसार में तो भगवान भी मानव रूप में आए। उन्होंने धरती के अनेक कष्ट दूर किए, लोगों को जीना सिखाया, सन्मार्ग दिखाया। कहा गया है -'सकल पदारथ है जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।' मनुष्य का जन्म रोने के लिए नहीं हुआ है। गृहस्थ अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए अच्छे कर्म करें, देश -समाज को कुछ दें, साधु -संत नैतिकता और धार्मिक प्रवृत्तियों को बढ़ाएं, कारोबारी और ईमानदारी से काम करें। जो जहां है, वही सच्चा रहे तो परम आनंद है। संघर्ष में भी आनंद है। सच पूछा जाए तो धरती में ही स्वर्ग है, यहीं नरक भी। मेरी बातें वह युवा साधु अनमने ढंग से सुनता रहा। ज्यादा देर तक अगर मैं उसके पास बैठता तो उसका निराशा का संक्रामक रोग मुझे भी लग जाता। दस रुपए देकर मैं उठा और यह कहकर चला - ' संगीत की तरह अपने जीवन को भी मधुर, रसयुक्त बनाइए। लोगों का उत्साह बढ़ाइए।'
हमारे-आपके आसपास भी बहुत से निराशावादी लोग रहते हैं। उनसे दूरी बनाकर रहने में ही भलाई है। मैंने कई ऐसे लोगों को बदलने की कोशिश की, लेकिन अपने कुतर्कों से बाज नहीं आए। बच्चों और युवाओं को तो ऐसे लोगों से बहुत ही दूर रहना चाहिए। संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है। हौसला बुलंद रहे तो सारी मुश्किलें आसान हो जाती हैं। यह संसार बहुत सुंदर है। देखने की दृष्टि अच्छी होनी चाहिए।
-राजकुमार धर द्विवेदी 

शनिवार, 10 मार्च 2018

संस्मरण खूंटा गांव की अनूठी रामलीला


काफी दिनों से मन में था कि खूंटा गांव की रामलीला के बारे में लिखूं। पहले तो यह बता दूं कि खूंटा मध्यप्रदेश के रीवा जिले का गांव है। यह रीवा -बनारस मार्ग पर पड़ने वाले हनुमना कस्बे से 14 -15 किलोमीटर दूर (हनुमना -हाटा के बीच) है। बचपन की जो स्मृतियां हैं, उन्हें बयां कर रहा हूं। 1974 -75 से 1978 तक मैंने खूंटा की रामलीला देखी है। अगर किसी को ज्ञात हो कि इस गांव में रामलीला की शुरुआत कब हुई और किसने की तो अवश्य साझा करें। मुझे ज्ञात नहीं है। हां, मेरे दादा जी आदरणीय श्री तेजप्रताप धर द्विवेदी जी (झरी) बताया करते थे कि बचपन में उन्होंने भी खूंटा की रामलीला देखी थी। वे बड़े ही मनोरंजक ढंग से 'लेदहवा राजा' का गेय संवाद सुनाया करते थे -'' मोर बूढ़े गरीब कै खटिया, कउन लइ गा चुराय।'' मैंने जब खूंटा की रामलीला देखी, उस समय व्यास गद्दी श्री लालता प्रसाद पाठक जी संभालते थे। ढोलक पांती शुक्लान के श्री रामसहोदर शुक्ल बजाया करते थे। आरती श्री विश्वनाथ पाठक जी करते थे। ये दशरथ और जनक की भूमिका भी बखूबी करते थे। राम की भूमिका श्यामलाल मिश्र (बचऊ ) निभाते थे। कभी -कभी सुग्गालाल पाठक भी राम का रोल किया करते थे। जोकर और महिला पात्र की भूमिका छोटे समौनी (तिलया) निभाते थे। बड़े अच्छे कलाकार समौनी जी। हंसा -हंसा कर लोटपोट कर देते थे। यही धनुष यज्ञ के मौके पर 'लेदहवा राजा' भी बना करते थे। कभी उनकी सवारी बाहर से 'नसेनी' (बांस की सीढी ) पर आती तो कभी अत्यंत मनोरंजक ढंग से पर्दा खुलने पर वे मंच पर प्रकट होते। उनकी विचित्र वेशभूषा और उनके संवाद से जोरदार ठहाके लगते थे। ताड़का चाची का भयंकर रूप भोला पयासी धरते थे। साक्षात् ताड़का। बच्चे डर जाते थे। मैं भी तब बच्चा ही था। खूब डरता था, जब ताड़का राम से कहती थी -'' तोहूं क खाब, तोरे भइअउ क खाब, बुड्ढे की चटनी बनाऊंगी।'' भैया यानी लक्ष्मण और बुड्ढा यानी विश्वामित्र। परशुराम की भूमिका रघुवंश पंडित निभाते थे। वे भी जलती हुई लुकाठी लेकर बाहर से दर्शकों के बीच प्रकट होते थे। लकड़ी के तख़्त पर ऐसे खड़ाऊं पटकते थे कि उनका गुस्सा देखकर दर्शक सहम जाते थे। मैंने बहुत जगह रामलीला देखी, लेकिन परशुराम का ऐसा रोल कहीं नहीं देखने को मिला। नमन पंडित महाराज को। कुछ संवाद सुनिए उनके -' ऐ मूढ़ जनक तू यह बतला, यह धनुहा किसने तोडा है, ऐसे भरे स्वयंवर में सीता से नाता जोड़ा है।' लक्ष्मण से संवाद भी अनूठा। बीच में लेदहवा राजा कुछ बोल पड़ता था तो उसकी तोंद पर सोटा चला देते थे। उसकी तोंद पर अपना फरसा भी टेया (धार देना ) करते थे। कई भाव एकसाथ। बाणासुर रामाश्रय महाराज बनते थे। रावण का दमदार रोला उमाशंकर महाराज करते थे। आप दोनों के संवाद अनूठे हुआ करते थे। व्यास लालता प्रसाद पाठक जी जैसे ही चौपाई बोलते थे -'तब रावण -बाणासुर आवा ----'', वैसे ही दोनों योद्धा दर्शकों के बीच कला -कौशल दिखाने दिखाने लगते थे। रामलीला गरमी के दिनों में हुआ करती थी। बुजुर्ग पात्र अब स्वर्गवासी हो चुके हैं। बाकी सब अपने काम में लग गए। यह रामलीला मेरी स्मृतियों में धुंधली -धुंधली बनी है। कभी विस्तार से, लोगों से चर्चा करके लिखूंगा। अभी लिखने का मकसद उन कलाकारों को याद करना था। साथ ही यह भी बताना था कि आज घर -घर राजनीति घर कर गई है, जबकि पहले मिठास थी। जिन पात्रों के नाम छूट गए, उनसे क्षमा याचना करता हूं।
- राजकुमार धर द्विवेदी