काफी दिनों से मन में था कि खूंटा गांव की रामलीला के बारे में लिखूं। पहले तो यह बता दूं कि खूंटा मध्यप्रदेश के रीवा जिले का गांव है। यह रीवा -बनारस मार्ग पर पड़ने वाले हनुमना कस्बे से 14 -15 किलोमीटर दूर (हनुमना -हाटा के बीच) है। बचपन की जो स्मृतियां हैं, उन्हें बयां कर रहा हूं। 1974 -75 से 1978 तक मैंने खूंटा की रामलीला देखी है। अगर किसी को ज्ञात हो कि इस गांव में रामलीला की शुरुआत कब हुई और किसने की तो अवश्य साझा करें। मुझे ज्ञात नहीं है। हां, मेरे दादा जी आदरणीय श्री तेजप्रताप धर द्विवेदी जी (झरी) बताया करते थे कि बचपन में उन्होंने भी खूंटा की रामलीला देखी थी। वे बड़े ही मनोरंजक ढंग से 'लेदहवा राजा' का गेय संवाद सुनाया करते थे -'' मोर बूढ़े गरीब कै खटिया, कउन लइ गा चुराय।'' मैंने जब खूंटा की रामलीला देखी, उस समय व्यास गद्दी श्री लालता प्रसाद पाठक जी संभालते थे। ढोलक पांती शुक्लान के श्री रामसहोदर शुक्ल बजाया करते थे। आरती श्री विश्वनाथ पाठक जी करते थे। ये दशरथ और जनक की भूमिका भी बखूबी करते थे। राम की भूमिका श्यामलाल मिश्र (बचऊ ) निभाते थे। कभी -कभी सुग्गालाल पाठक भी राम का रोल किया करते थे। जोकर और महिला पात्र की भूमिका छोटे समौनी (तिलया) निभाते थे। बड़े अच्छे कलाकार समौनी जी। हंसा -हंसा कर लोटपोट कर देते थे। यही धनुष यज्ञ के मौके पर 'लेदहवा राजा' भी बना करते थे। कभी उनकी सवारी बाहर से 'नसेनी' (बांस की सीढी ) पर आती तो कभी अत्यंत मनोरंजक ढंग से पर्दा खुलने पर वे मंच पर प्रकट होते। उनकी विचित्र वेशभूषा और उनके संवाद से जोरदार ठहाके लगते थे। ताड़का चाची का भयंकर रूप भोला पयासी धरते थे। साक्षात् ताड़का। बच्चे डर जाते थे। मैं भी तब बच्चा ही था। खूब डरता था, जब ताड़का राम से कहती थी -'' तोहूं क खाब, तोरे भइअउ क खाब, बुड्ढे की चटनी बनाऊंगी।'' भैया यानी लक्ष्मण और बुड्ढा यानी विश्वामित्र। परशुराम की भूमिका रघुवंश पंडित निभाते थे। वे भी जलती हुई लुकाठी लेकर बाहर से दर्शकों के बीच प्रकट होते थे। लकड़ी के तख़्त पर ऐसे खड़ाऊं पटकते थे कि उनका गुस्सा देखकर दर्शक सहम जाते थे। मैंने बहुत जगह रामलीला देखी, लेकिन परशुराम का ऐसा रोल कहीं नहीं देखने को मिला। नमन पंडित महाराज को। कुछ संवाद सुनिए उनके -' ऐ मूढ़ जनक तू यह बतला, यह धनुहा किसने तोडा है, ऐसे भरे स्वयंवर में सीता से नाता जोड़ा है।' लक्ष्मण से संवाद भी अनूठा। बीच में लेदहवा राजा कुछ बोल पड़ता था तो उसकी तोंद पर सोटा चला देते थे। उसकी तोंद पर अपना फरसा भी टेया (धार देना ) करते थे। कई भाव एकसाथ। बाणासुर रामाश्रय महाराज बनते थे। रावण का दमदार रोला उमाशंकर महाराज करते थे। आप दोनों के संवाद अनूठे हुआ करते थे। व्यास लालता प्रसाद पाठक जी जैसे ही चौपाई बोलते थे -'तब रावण -बाणासुर आवा ----'', वैसे ही दोनों योद्धा दर्शकों के बीच कला -कौशल दिखाने दिखाने लगते थे। रामलीला गरमी के दिनों में हुआ करती थी। बुजुर्ग पात्र अब स्वर्गवासी हो चुके हैं। बाकी सब अपने काम में लग गए। यह रामलीला मेरी स्मृतियों में धुंधली -धुंधली बनी है। कभी विस्तार से, लोगों से चर्चा करके लिखूंगा। अभी लिखने का मकसद उन कलाकारों को याद करना था। साथ ही यह भी बताना था कि आज घर -घर राजनीति घर कर गई है, जबकि पहले मिठास थी। जिन पात्रों के नाम छूट गए, उनसे क्षमा याचना करता हूं।
- राजकुमार धर द्विवेदी
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