कुछ दोहे - संदर्भ होली
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होली सबकी मन गई, बरसा रंग -गुलाल।
ढोल -नगाड़े भी बजे, जमकर हुआ धमाल।।
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कोई नाली में गिरा, करके मदिरापान।
कोई भांग चढ़ाय के, सोया चादर तान।।
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कोई गुझिया खाय के, लेता रहा डकार।
कोई गोली खा रहा, अब तो सांझ -सकार।।
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कोई अब भी मस्त हैं, छान गले तक भंग।
गली -सड़क पर कर रहे, जीभरकर हुड़दंग।।
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दो दिन मस्ती कर लिए, पाए सुक्ख अपार।
कामकाज में लग गए, अब तो राजकुमार।।
- राजकुमार धर द्विवेदी
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होली सबकी मन गई, बरसा रंग -गुलाल।
ढोल -नगाड़े भी बजे, जमकर हुआ धमाल।।
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कोई नाली में गिरा, करके मदिरापान।
कोई भांग चढ़ाय के, सोया चादर तान।।
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कोई गुझिया खाय के, लेता रहा डकार।
कोई गोली खा रहा, अब तो सांझ -सकार।।
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कोई अब भी मस्त हैं, छान गले तक भंग।
गली -सड़क पर कर रहे, जीभरकर हुड़दंग।।
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दो दिन मस्ती कर लिए, पाए सुक्ख अपार।
कामकाज में लग गए, अब तो राजकुमार।।
- राजकुमार धर द्विवेदी
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