रविवार, 11 मार्च 2018

संस्मरण


संगीत की मघुर स्वर लहरी और वह साधु
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सालों पहले की बात है। तब मैं मध्यप्रदेश के मंडला जिला मुख्यालय में पत्रकारिता करता था। शाम को अक्सर माता नर्मदा की आरती में शामिल होने रपटा घाट जाया करता था। एक दिन कुछ जल्दी पहुंच गया। कानों में संगीत की मधुर स्वर लहरियां सुनाई दीं। मैं खिंचता चला गया। मंदिर में एक युवा साधु
इकतारा बजा रहा था। मैं चुपचाप उसके पास बैठकर संगीत का आनंद लेने लगा। उसकी आंखें बंद थीं। वह भाव में खोया हुआ था। कुछ देर बाद उसने वादन ख़त्म किया तो मैंने  उसकी तारीफ की। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो उसने बड़ी निराशा की बात की। वह बोला -'जीवन में बड़ा दुख है। यह संसार ही दुख का सागर है। सोचता हूं कि कहां आकर फंस गया ? जल्दी मुक्ति मिले। ' यह सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि इतना कर्णप्रिय संगीत सुनाने वाला आदमी ऐसा विचार कैसे रख सकता है ? इस संसार में तो भगवान भी मानव रूप में आए। उन्होंने धरती के अनेक कष्ट दूर किए, लोगों को जीना सिखाया, सन्मार्ग दिखाया। कहा गया है -'सकल पदारथ है जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।' मनुष्य का जन्म रोने के लिए नहीं हुआ है। गृहस्थ अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए अच्छे कर्म करें, देश -समाज को कुछ दें, साधु -संत नैतिकता और धार्मिक प्रवृत्तियों को बढ़ाएं, कारोबारी और ईमानदारी से काम करें। जो जहां है, वही सच्चा रहे तो परम आनंद है। संघर्ष में भी आनंद है। सच पूछा जाए तो धरती में ही स्वर्ग है, यहीं नरक भी। मेरी बातें वह युवा साधु अनमने ढंग से सुनता रहा। ज्यादा देर तक अगर मैं उसके पास बैठता तो उसका निराशा का संक्रामक रोग मुझे भी लग जाता। दस रुपए देकर मैं उठा और यह कहकर चला - ' संगीत की तरह अपने जीवन को भी मधुर, रसयुक्त बनाइए। लोगों का उत्साह बढ़ाइए।'
हमारे-आपके आसपास भी बहुत से निराशावादी लोग रहते हैं। उनसे दूरी बनाकर रहने में ही भलाई है। मैंने कई ऐसे लोगों को बदलने की कोशिश की, लेकिन अपने कुतर्कों से बाज नहीं आए। बच्चों और युवाओं को तो ऐसे लोगों से बहुत ही दूर रहना चाहिए। संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है। हौसला बुलंद रहे तो सारी मुश्किलें आसान हो जाती हैं। यह संसार बहुत सुंदर है। देखने की दृष्टि अच्छी होनी चाहिए।
-राजकुमार धर द्विवेदी 

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