मित्रो, यह दुर्लभ तस्वीर देखिए। इसमें एक मस्त ग्रामीण बालक के साथ हैं देश के प्रखर पत्रकार श्री निरंजन शर्मा जी। कितनी सरलता, कितनी स्वाभाविकता। उम्र में काफी फर्क, लेकिन दिल एक -सा। दिल, दिल की खबर रखता है, उसे आदमी की सच्ची पहचान होती है, परख होती है। देखिए, तभी तो एक नन्हा बालक उतना ही मस्त है, जितने आदरणीय शर्मा जी। न कोई झेंप, न डर। यह मेरा सौभाग्य है कि श्री शर्मा जी के मार्गदर्शन में मुझे काम करने का मौका मिला है। जब आदरणीय सतना से प्रकाशित 'नेशनल टुडे न्यूज़' के संपादक थे, तब मैं इनका सहयोगी था। एक कुशल लेखक, संपादक और दमदार व्यक्तित्व के साथ ही ऐसे सरल -सहज भी हैं शर्मा जी। छोटे -से -छोटे आदमी से हाथ मिलाते, उसके साथ उठते -बैठते देखा है मैंने इन्हें। स्वाभिमान परशुराम-जैसा है, लेकिन अभिमान तनिक भी नहीं। ऐसी महान शख्सियत को दिल से नमन। वंदन।
शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
वाह, क्या बात है
मित्रो, यह दुर्लभ तस्वीर देखिए। इसमें एक मस्त ग्रामीण बालक के साथ हैं देश के प्रखर पत्रकार श्री निरंजन शर्मा जी। कितनी सरलता, कितनी स्वाभाविकता। उम्र में काफी फर्क, लेकिन दिल एक -सा। दिल, दिल की खबर रखता है, उसे आदमी की सच्ची पहचान होती है, परख होती है। देखिए, तभी तो एक नन्हा बालक उतना ही मस्त है, जितने आदरणीय शर्मा जी। न कोई झेंप, न डर। यह मेरा सौभाग्य है कि श्री शर्मा जी के मार्गदर्शन में मुझे काम करने का मौका मिला है। जब आदरणीय सतना से प्रकाशित 'नेशनल टुडे न्यूज़' के संपादक थे, तब मैं इनका सहयोगी था। एक कुशल लेखक, संपादक और दमदार व्यक्तित्व के साथ ही ऐसे सरल -सहज भी हैं शर्मा जी। छोटे -से -छोटे आदमी से हाथ मिलाते, उसके साथ उठते -बैठते देखा है मैंने इन्हें। स्वाभिमान परशुराम-जैसा है, लेकिन अभिमान तनिक भी नहीं। ऐसी महान शख्सियत को दिल से नमन। वंदन।
शुक्रवार, 14 नवंबर 2014
ऐसे गुरु विरले ही
बिना किसी कारण मैंने अपने गुरुदेव पंडित अरुण चौबे जी महाराज के पास जाना बंद कर दिया था। एक साल तक नहीं गया, लेकिन उनका स्मरण हमेशा रहता था। अभी एक दिन नहाने के बाद जैसे ही हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया, वैसे ही इच्छा बलवती हो गई कि आज गुरुदेव के पास जाना है। पूजा-पाठ करके चल पड़ा। गुरुदेव के आश्रम में पहुंचा तो वे मुझे देखकर बेहद खुश हुए और दिल से आशीर्वाद बरसाने लगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा -'आप बहुत दिनों के बाद आए। एक साल अठारह दिन बाद।' यह सुनकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि गुरुदेव ने मेरी गैरमौजूदगी का पूरा ब्यौरा याद कर रखा है। मेरे एक गुरु भाई ने कहा -'गुरूजी आपको हमेशा याद किया करते थे। कोई त्योहार पड़ता था तो आपका इंतज़ार किया करते थे। यह सुनकर मुझे बेहद अफसोस हुआ। मैंने गुरुदेव के पैर पकड़ कर क्षमा मांगी। वे हंसने लगे और बोले -'कोई बात नहीं। हो जाता है कभी -कभी। आप आते हैं तो अच्छा लगता है। आया कीजिए। ' मैंने उन्हें आते रहने का वचन दिया। कुछ देर तक मैं वहां बैठा। बहुत अच्छा लगा। बड़ी संख्या में लोग थे। गुरुदेव उनकी समस्याओं का निदान कर रहे थे। कई बातें मैंने भी सीखीं। मैं वहां से ऊर्जा लेकर लौटा। सारी थकान और पीड़ा दूर हो गई।
इस स्वार्थी दुनिया में कौन, किसको याद रखता है? मतलब है तो राम-राम, काम निकल गया तो भूल गए। लेकिन माता -पिता और सच्चे गुरु कभी नहीं भूलते। मेरी मां को भी एक -एक दिन याद रहता है। गुरुदेव ने जब 'एक साल अठारह दिन' कहा तो मां की याद आई और लगा कि गुरु और मां समान ही हैं। मुझे अपनी गलती पर अभी तक पछतावा है। ऐसे गुरु विरले ही हैं। लूटने वाले कई मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे गुरु कहां , जो बिना किसी स्वार्थ के अपने शिष्यों को याद रखते हैं ?
-राजकुमार धर द्विवेदी
मंगलवार, 11 नवंबर 2014
वारिस
लघुकथा
हिंदी के एक समर्पित साहित्यकार सूर्यकांतजी काफी बूढ़े हो चुके थे। मौत को सन्निकट महसूस करके एक दिन वे परिजनों को पास बुलाकर बोले -'' अब मेरा भगवान के घर से कभी भी बुलावा आ सकता है। मैं चाहता हूं कि मेरे पास जो संपदा है, उसे तुम लोगों को दे दूं।''
यह सुनकर छोटे बेटे कविनंदन को छोड़ कर बाकी बहू -बेटे खुश हो गए। वे तो काफी दिनों से पैतृक संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए थे। बेटे बंटवारे के लिए पिता से कई बार विवाद भी कर चुके थे। छोटा बेटा इतना दुष्ट था कि पिता की पूरी संपत्ति खुद ही हड़प कर जाना चाहता था।
उस दिन पिता ने बंटवारे की बात की तो छोटा बेटा कविनंदन भड़क उठा। उसने कहा -'' पिताजी, आपकी सारी संपत्ति मेरी है। किसी को नहीं मिलेगी फूटी कौड़ी। अगर आपने मेरे अलावा किसी को कुछ दिया तो मैं आपकी जान ले लूंगा। ''
यह सुनना था कि बाकी के दो भाई शारदा प्रसाद और कविभूषण, कविनंदन से विवाद करने लगे। पिता ने किसी तरह विवाद शांत कराया। इसके बाद वे बोले -'' देखो बच्चो, मेरे पास मां सरस्वती के प्रसाद के अलावा और कुछ भी नहीं है। मैंने जीवनभर हिंदी की सेवा की है। मेरी ये किताबें ही मेरी संपत्ति हैं। जितना रुपया -पैसा था, उसे मैंने हिंदी के प्रचार -प्रसार में लगा दिया। मेरी इच्छा है कि मेरा अधूरा रह गया हिंदी का सेवा -कार्य तुम तीनों भाई मिल -बांटकर करो।''
''भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा सेवा -कार्य। तुम पिता हो कि शत्रु ? मन करता है कि अभी तुम्हारा गला दबा दूं।'' छोटे बेटे कविनंदन ने कहा।
''ठीक कह रहा है कविनंदन। पिताजी, हम सभी भाई घर से बाहर नौकरी करने चले गए तो आपने सारी संपत्ति इस बेकार के काम में लगा दी। हम जा रहे हैं। आपकी कोई लाश उठाने वाला नहीं होगा। '' शारदा प्रसाद बोला।
''हां -हां, मैं भी जा रहा हूं। पिताजी आपके क्रिया -कर्म में भी नहीं आऊंगा।'' कविभूषण ने कहा।
सब लोग जाने लगे, तभी छोटे बेटे कविनंदन की चौदह वर्षीया बेटी सरस्वती ने आगे बढ़कर सभी को रोका और कहा -'' दादाजी के अधूरे कार्य मैं पूरे करूंगी। मैं करूंगी हिंदी की सेवा। ------दादाजी, आप चिंता न करें। आपकी सभी किताबें सुरक्षित रहेंगी। मैं आजीवन हिंदी बोलूंगी, पढ़ूंगी, लिखूंगी और इसका प्रचार -प्रसार करूंगी। आप अपनी संपदा की वारिस मुझे बनाइए।''
यह सुनकर सभी लोग सन्न रह गए। बूढ़े साहित्यकार उठकर पोती को कलेजे से चिपका लिए और रोते हुए बोले -''वाह, बिटिया वाह। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम ही मेरी वारिस हो। बाकी तो ये सभी नालायक निकले। लालच ने इन्हें विवेक -शून्य बना दिया। मां के प्रसाद स्वरूप इन हिंदी के ग्रंथों को ठुकरा दिया, जिसकी रोटी खा रहे हैं। ----शर्म करो नालायको, तुम तीनों हिंदी का प्रचार -प्रसार करने वाले संस्थानों में अधिकारी हो----मैंने सोचा था ---''
साहित्यकार महोदय अपनी बात पूरी करने की कोशिश कर रहे थे , तभी उन्हें जानलेवा खांसी आई और कुछ देर में उन्होंने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।
-राजकुमार धर द्विवेदी
हिंदी के एक समर्पित साहित्यकार सूर्यकांतजी काफी बूढ़े हो चुके थे। मौत को सन्निकट महसूस करके एक दिन वे परिजनों को पास बुलाकर बोले -'' अब मेरा भगवान के घर से कभी भी बुलावा आ सकता है। मैं चाहता हूं कि मेरे पास जो संपदा है, उसे तुम लोगों को दे दूं।''
यह सुनकर छोटे बेटे कविनंदन को छोड़ कर बाकी बहू -बेटे खुश हो गए। वे तो काफी दिनों से पैतृक संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए थे। बेटे बंटवारे के लिए पिता से कई बार विवाद भी कर चुके थे। छोटा बेटा इतना दुष्ट था कि पिता की पूरी संपत्ति खुद ही हड़प कर जाना चाहता था।
उस दिन पिता ने बंटवारे की बात की तो छोटा बेटा कविनंदन भड़क उठा। उसने कहा -'' पिताजी, आपकी सारी संपत्ति मेरी है। किसी को नहीं मिलेगी फूटी कौड़ी। अगर आपने मेरे अलावा किसी को कुछ दिया तो मैं आपकी जान ले लूंगा। ''
यह सुनना था कि बाकी के दो भाई शारदा प्रसाद और कविभूषण, कविनंदन से विवाद करने लगे। पिता ने किसी तरह विवाद शांत कराया। इसके बाद वे बोले -'' देखो बच्चो, मेरे पास मां सरस्वती के प्रसाद के अलावा और कुछ भी नहीं है। मैंने जीवनभर हिंदी की सेवा की है। मेरी ये किताबें ही मेरी संपत्ति हैं। जितना रुपया -पैसा था, उसे मैंने हिंदी के प्रचार -प्रसार में लगा दिया। मेरी इच्छा है कि मेरा अधूरा रह गया हिंदी का सेवा -कार्य तुम तीनों भाई मिल -बांटकर करो।''
''भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा सेवा -कार्य। तुम पिता हो कि शत्रु ? मन करता है कि अभी तुम्हारा गला दबा दूं।'' छोटे बेटे कविनंदन ने कहा।
''ठीक कह रहा है कविनंदन। पिताजी, हम सभी भाई घर से बाहर नौकरी करने चले गए तो आपने सारी संपत्ति इस बेकार के काम में लगा दी। हम जा रहे हैं। आपकी कोई लाश उठाने वाला नहीं होगा। '' शारदा प्रसाद बोला।
''हां -हां, मैं भी जा रहा हूं। पिताजी आपके क्रिया -कर्म में भी नहीं आऊंगा।'' कविभूषण ने कहा।
सब लोग जाने लगे, तभी छोटे बेटे कविनंदन की चौदह वर्षीया बेटी सरस्वती ने आगे बढ़कर सभी को रोका और कहा -'' दादाजी के अधूरे कार्य मैं पूरे करूंगी। मैं करूंगी हिंदी की सेवा। ------दादाजी, आप चिंता न करें। आपकी सभी किताबें सुरक्षित रहेंगी। मैं आजीवन हिंदी बोलूंगी, पढ़ूंगी, लिखूंगी और इसका प्रचार -प्रसार करूंगी। आप अपनी संपदा की वारिस मुझे बनाइए।''
यह सुनकर सभी लोग सन्न रह गए। बूढ़े साहित्यकार उठकर पोती को कलेजे से चिपका लिए और रोते हुए बोले -''वाह, बिटिया वाह। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम ही मेरी वारिस हो। बाकी तो ये सभी नालायक निकले। लालच ने इन्हें विवेक -शून्य बना दिया। मां के प्रसाद स्वरूप इन हिंदी के ग्रंथों को ठुकरा दिया, जिसकी रोटी खा रहे हैं। ----शर्म करो नालायको, तुम तीनों हिंदी का प्रचार -प्रसार करने वाले संस्थानों में अधिकारी हो----मैंने सोचा था ---''
साहित्यकार महोदय अपनी बात पूरी करने की कोशिश कर रहे थे , तभी उन्हें जानलेवा खांसी आई और कुछ देर में उन्होंने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।
-राजकुमार धर द्विवेदी
कुछ दोहे हौसला बढ़ाने वाले
आगे कदम बढ़ाइए, बाधा को ललकार।
मंज़िल देने के लिए, खड़ी लिए उपहार।।
----------------------------------------------
कायर उसको मानिए, माने जो भी हार।
जो करता संघर्ष है, पाता खुशी अपार।।
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आलस बाधा है बड़ी, सक्रियता है शक्ति।
आशा कभी न छोड़िए, श्रम की करिए भक्ति।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
सोमवार, 10 नवंबर 2014
कुछ दोहे
चाटुकार यदि हो नहीं, सदा सहोगे पीर।
घुटने के नीचे रहो, खाओ पूड़ी -खीर।।
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गद्दारों की वंदना, उनकी ही जयकार।
जो ऐसा करते नहीं, पाते हैं दुत्कार।।
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-राजकुमार धर द्विवेदी
अच्छे लोग -------!
संस्मरणसालों पहले की बात है। भोपाल में मैं एक सज्जन के घर गया था। हाल ही में उनसे परिचय हुआ था। यहां -वहां की बातें हो रही थीं। उसी बीच उन सज्जन की पत्नी ने उन्हें बताया -'पड़ोस में एक देहाती -परिवार रहने आ गया है। आदमी ट्रक चलाता है, औरत कामवाली बाई है। उनके बच्चे बड़े गंदे हैं। मुझे बड़ी चिंता हो रही है कि उनके बच्चों की संगति में अपने बच्चे कहीं बिगड़ जाएं।'
सज्जन ने तत्काल अपने नए पड़ोसी यानी ट्रक ड्राइवर को बुलाकर हड़काया -'देखो भाई, मैं अपने घर में कहीं ताला नहीं लगाता। अगर मेरा कोई सामान चोरी गया तो ठीक नहीं होगा।'
यह मुझे कतई अच्छा नहीं लगा। ट्रकवाले ने खुद को बहुत ही अपमानित महसूस किया। बुलाने पर वह दौड़ते हुए आया था। बहुत ही सलीके से हम सभी से नमस्कार किया था। उसने कहा -'आप कैसी बात कर रहे हैं, साहब ? हम चोर -चकार नहीं हैं। गांव में बच्चे ठीक से पढ़ते -लिखते नहीं थे, इसलिए परिवार शहर लाया हूं आप अच्छे लोगों के बीच। मेहनत -मजदूरी करके बच्चों को लायक बनाना है। आप चिंता न करें। हम गरीब भले ही हैं, लेकिन परिवार को अच्छे संस्कार दिए हैं। हम आपकी किसी चीज की ओर देखेंगे तक नहीं।'
यह कह कर ट्रक ड्राइवर चला गया। उसके जाने के बाद मैं भी वहां ज्यादा देर तक नहीं बैठ सका। उस कथित अच्छे परिवार से मुझे घृणा हो गई। दरअसल वे सज्जन मेरे संस्थान में काम पाना चाहते थे, इसलिए मेरी खुशामद कर रहे थे। खिलाने -पिलाने के लिए घर ले गए थे। वे सरकारी नौकरी में थे , लेकिन घपलेबाजी में निलंबित थे। आय कम हो गई थी , इसलिए चाहते थे कि प्रेस में ही कोई काम मिल जाए। मैंने सोचा कि ऐसी सोच वाले आदमी की मैं कतई सिफारिश नहीं करूंगा। उन्हें मेरे संस्थान में काम नहीं मिला। मैंने प्रबंधन से उस ड्राइवर वाली घटना का जिक्र किया तो उस सज्जन के लिए प्रेस का दरवाजा बंद हो गया।
उस कॉलोनी में मेरे एक सहयोगी रह चुके थे। वे कहने लगे -'उस ट्रक ड्राइवर से कहिए कि वह वहां से चला जाए। वहां उसके बाल-बच्चे बिगड़ जाएंगे। वहां बड़े -बड़े भ्रष्टाचारी रहते हैं। उनके चरित्र को मैं अच्छी तरह जानता हूं। जैसा खुद को दिखाने की कोशिश करते हैं , वैसे हैं नहीं। बड़े -बड़े घोटाले करके बैठे हैं। क्या नहीं होता वहां ? वहीं से कुछ दिनों पहले चार कॉल गर्ल्स पकड़ी गई थीं। कॉलोनी की कुछ महिलाएं भी धंधा कराती हैं। एक गरीब रहने गया तो उसे भगाने पर तुल गए।'
सालों पहले की बात मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। उस ट्रक ड्राइवर का चेहरा मुझे अक्सर याद आ जाता है। खुद को अच्छा मानने वाले लोगों की यह कैसी अच्छाई है ? क्या भौतिक सुख -सुविधाएं पा लेना ही सब कुछ है ? जिनमें अच्छे संस्कार का बीजारोपण नहीं हुआ, वे चाहे दौलत का पहाड़ खड़ा कर लें, पिछड़े ही कहलाएंगे।
-राजकुमार धर द्विवेदी
गुरुवार, 6 नवंबर 2014
बुधवार, 5 नवंबर 2014
अब तो अपने गांव में
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में,
चालें, तिकड़म , तोड़फोड़ ही अब तो अपने गांव में .
नदिया सूखी, पोखर खाली, गंदा पानी ताल में,
सूखी फसलें, रोती जनता, कुछ तो काला दाल में .
बरगद की छाया को तरसें अब तो अपने गांव में,
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में.
-----------------------------------------------------
नेता -अफसर मौज उड़ाते, जनता फंसती जाल में,
नहीं तरक्की लिखी हुई है, कहती अम्मां भाल में .
रामराज्य का राग अलापें ठगुआ अपने गांव में ,
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में.
-राजकुमार धर द्विवेदी
सूखी फसलें, रोती जनता, कुछ तो काला दाल में .
बरगद की छाया को तरसें अब तो अपने गांव में,
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में.
-----------------------------------------------------
नेता -अफसर मौज उड़ाते, जनता फंसती जाल में,
नहीं तरक्की लिखी हुई है, कहती अम्मां भाल में .
रामराज्य का राग अलापें ठगुआ अपने गांव में ,
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में.
-राजकुमार धर द्विवेदी
यह है सच्चा प्रीति-भोज
सत्रह साल बाद भाई हरिहर तिवारी जी के साथ
भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .भाभी जी को भलीभांति मालूम है कि मुझे
खाने में क्या पसंद है .मनपसंद खाना और स्नेह ----बात करते -करते खूब खा
गया .वाकई यही प्रीतिभोज है, जिसकी मिठास कभी कम नहीं हो सकती .मुझे अच्छी
तरह जानने वाले लोग यह जानते हैं कि मैं बहुत ही कम लोगों के घर जाता हूं
.खाना तो ऐसे ही आत्मीय जनों के यहां खाता हूं . खाना तो कहीं भी मिल
जाएगा, लेकिन ऐसा स्नेह दुर्लभ है .
मंगलवार, 4 नवंबर 2014
याद आते हैं छठिलाल पंडित जी
इस पर वे कहते -'नहीं। खाता मैं हूं तो गठरी कौन ढोए ? गठरी सिर पर रखने से मैं छोटा नहीं हो जाऊंगा। अपना काम है, कोई कुछ कहता रहे, इसमें लाज -शर्म कैसी ?' जब कोई रास्ते में मिल जाता और गठरी लेने लगता तो वे साफ मना कर देते।
जहां तक मुझे याद है। वे रीवा [मध्यप्रदेश ] के देवतालाब इलाके के रहने वाले थे। देवतालाब से हनुमना तक वाहन सुविधा थी। लेकिन मेरे गांव तक का सफर बहुत ही कठिन था। वे एक महीने का राशन घर से लाते थे। गांव के लोग उन्हें खाने पर बुलाते थे, लेकिन वे विनम्रता से मना कर देते थे। स्कूल में ही खाना बनाते और खाते थे। पढ़ाने -लिखाने में एक नंबर थे। कभी -कभी बच्चों को रात को भी बुलाकर पढ़ाया करते थे। नैतिक शिक्षा पर बहुत ही जोर देते थे। कहा करते -' किताबी कीड़ा मत बनो। शिक्षा का मतलब संस्कार भी है। संस्कार के बिना शिक्षा बेकार है। '
पढ़ाने -लिखाने के साथ ही वे स्कूल की मरम्मत भी किया करते थे। मजदूरों के साथ स्कूल की छवाई करते मैंने उन्हें कई बार देखा था। इसके अलावा गांव के झगड़े -टंटे भी ख़त्म कराया करते थे। गांव में उनका बड़ा मान था।
वे बड़े विनोदी भी थे। मेरा सामने का एक दूधिया दांत टूट गया था। उन्होंने देखा तो हंसते हुए कहा -'मां ने लोढ़ा मार दिया क्या रे ?'
आज शिक्षक दिवस पर उनकी बहुत याद आ रही है। वाकई ऐसे शिक्षक राष्ट्रपति पुरस्कार के हक़दार होते हैं। लेकिन आज के ज़माने में ऐसे शिक्षक दुर्लभ हैं। नमन गुरुदेव।
-राजकुमार धर द्विवेदी
एक थे हनफ़ी भाई
यादें
सतना [मध्यप्रदेश] में एक शायर थे - हनफ़ी भाई।
पेशे से टेलर थे। उन दिनों मैं 'नेशनल टुडे न्यूज़' में काम करता था। हनफ़ी
भाई मेरे पास आया करते थे। मैं उनकी शायरी बड़े ही सम्मान के साथ प्रकाशित
किया करता था। वे हिन्दी कम जानते थे। मैं रचना मांगता तो हंस कर कहते
-'लो, लिख लो, राज भाई। आज ही एक ग़ज़ल कही है मैंने।' वे बोलते और मैं लिख
लेता। इसके बाद वे उसे पढ़ते और कहीं कोई शब्द गलत लिखा होता तो उसकी ओर
मेरा ध्यान आकृष्ट कराते। उनकी संगति में मैंने शायरी का 'ककहरा' सीखा था।
उनका मंच -संचालन और काव्य -पाठ बेहद उम्दा था। वे जिस मंच पर होते, वहां
रौनक बनी रहती। अच्छे कवि -शायर को दिल खोलकर दाद देते, लेकिन अगर किसी ने
शब्दों का गलत उच्चारण किया या शेखी बघारी तो उसे झाड़ने से भी बाज नहीं आते
थे। यही कारण था कि कथित साहित्यकार उनसे छरकते थे और उनकी बेबुनियाद
आलोचना किया करते थे। लेकिन खुशदिल इंसान हनफ़ी भाई इसकी परवाह नहीं किया
करते थे।
दो -चार दिन में वे मुझसे मिलने आ ही जाया करते थे। परिचय के शुरुआती दिनों में वे एक बार आए और बोले -'राज भाई, एक जरूरी काम है आपसे।'
यह सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं रुपया -पैसा तो नहीं मांगेंगे। क्योंकि कई कवि ऐसा कर चुके थे। परिचय बढ़ाकर पैसा मांगते थे और फिर दिया गया पैसा लौटाने का नाम नहीं लिया करते थे। लेकिन हनफ़ी भाई उन लोगों में नहीं थे। वे बड़े ही स्वाभिमानी थे। गरीबी में गुजारा कर लेते थे, लेकिन किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया करते थे।
हां तो मैं बता रहा था कि हनफ़ी भाई ने कहा कि एक जरूरी काम है। मैंने काम पूछा तो बोले -'एक मुशायरे में चलना है। आज ही शाम को।'
यह सुनकर मैं हंसा और बोला -'मुशायरे में चलना है ? मैंने आपकी गंभीरता देखकर समझा कि कोई खास काम होगा।'
'तो आप भी साहित्य को खास काम नहीं मानते ?' उन्होंने मज़ाकिया लहजे में सवाल किया और बोलना जारी रखा -'मैंने दुमदारों को दूर रखा है और दमदारों को बुलाया है। ऐसे लोगों को, जो मंच को गरिमा प्रदान करें। लटके -झटके वाले और चुटकुलेबाज नहीं चलेंगे वहां। साहित्य-कर्म गंभीरता का ही विषय है। बहुत सोच -समझकर लोगों को बुलाना पड़ता है। नाक का सवाल है। चुटकुलेबाजों ने मंच बिगाड़ कर दिया है। '
मैं उस मंच पर गया। वहां हनफ़ी भाई का हुनर देखा तो बेहद खुश हुआ।
साहित्य के प्रति उनका समर्पण अनुकरणीय था। श्रोताओं को बांधकर रखने की कला उनमें बखूबी थी। वे कहा करते -' लोग समय निकालकर हमें सुनने आते हैं। हम कुछ उम्दा पेश करें , ताकि वे खुश होकर जाएं, उन्हें कुछ अच्छा मिले। ऐसा करने से ही मंचों का वजूद बचा रहेगा। आज मंचों से जो अरुचि हो रही है, उसके लिए वे कवि -शायर दोषी हैं, जो कुछ भी सुनाए रहते हैं। चुटकुलेबाजो को आउट करना है। '
ऐसे शायर को हम सभी के बीच रहना था, लेकिन एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। उन्हें गुजरे हुए सालों बीत गए, लेकिन मुझे उनकी याद आती रहती है। कवि -शायर मित्रों से उनके साहित्य के प्रति अनुराग की चर्चा करते हुए मुझे सुखद अनुभूति होती है।
-राजकुमार धर द्विवेदी
दो -चार दिन में वे मुझसे मिलने आ ही जाया करते थे। परिचय के शुरुआती दिनों में वे एक बार आए और बोले -'राज भाई, एक जरूरी काम है आपसे।'
यह सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं रुपया -पैसा तो नहीं मांगेंगे। क्योंकि कई कवि ऐसा कर चुके थे। परिचय बढ़ाकर पैसा मांगते थे और फिर दिया गया पैसा लौटाने का नाम नहीं लिया करते थे। लेकिन हनफ़ी भाई उन लोगों में नहीं थे। वे बड़े ही स्वाभिमानी थे। गरीबी में गुजारा कर लेते थे, लेकिन किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया करते थे।
हां तो मैं बता रहा था कि हनफ़ी भाई ने कहा कि एक जरूरी काम है। मैंने काम पूछा तो बोले -'एक मुशायरे में चलना है। आज ही शाम को।'
यह सुनकर मैं हंसा और बोला -'मुशायरे में चलना है ? मैंने आपकी गंभीरता देखकर समझा कि कोई खास काम होगा।'
'तो आप भी साहित्य को खास काम नहीं मानते ?' उन्होंने मज़ाकिया लहजे में सवाल किया और बोलना जारी रखा -'मैंने दुमदारों को दूर रखा है और दमदारों को बुलाया है। ऐसे लोगों को, जो मंच को गरिमा प्रदान करें। लटके -झटके वाले और चुटकुलेबाज नहीं चलेंगे वहां। साहित्य-कर्म गंभीरता का ही विषय है। बहुत सोच -समझकर लोगों को बुलाना पड़ता है। नाक का सवाल है। चुटकुलेबाजों ने मंच बिगाड़ कर दिया है। '
मैं उस मंच पर गया। वहां हनफ़ी भाई का हुनर देखा तो बेहद खुश हुआ।
साहित्य के प्रति उनका समर्पण अनुकरणीय था। श्रोताओं को बांधकर रखने की कला उनमें बखूबी थी। वे कहा करते -' लोग समय निकालकर हमें सुनने आते हैं। हम कुछ उम्दा पेश करें , ताकि वे खुश होकर जाएं, उन्हें कुछ अच्छा मिले। ऐसा करने से ही मंचों का वजूद बचा रहेगा। आज मंचों से जो अरुचि हो रही है, उसके लिए वे कवि -शायर दोषी हैं, जो कुछ भी सुनाए रहते हैं। चुटकुलेबाजो को आउट करना है। '
ऐसे शायर को हम सभी के बीच रहना था, लेकिन एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। उन्हें गुजरे हुए सालों बीत गए, लेकिन मुझे उनकी याद आती रहती है। कवि -शायर मित्रों से उनके साहित्य के प्रति अनुराग की चर्चा करते हुए मुझे सुखद अनुभूति होती है।
-राजकुमार धर द्विवेदी
आज के प्यार पर कुछ दोहे
समझ न आता आज का, मुझको सचमुच प्यार।
रोज बदलती लड़कियां, कपड़े -जैसे यार।।
---------------------------------------------------------
लंच करे मुसकाय के, छोरी शिव के साथ।
डिनर कराने के लिए, मिल जाते प्रभुनाथ।।
--------------------------------------------------------
कभी श्याम की कार में, बैठे ठगनी धाय।
बाइक पर घूमे कभी, गिरधर को बहलाय।।
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मौज़ करत हैं छोरियां, नाजुक अंग दिखाय।
खाली जेब करा रहीं, अपने जाल फंसाय।।
---------------------------------------------------
बिगड़े छोरा -छोरियां, फैशन में बौराय।
'राज' पूछता आप से, दोषी कौन कहाय।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
रोज बदलती लड़कियां, कपड़े -जैसे यार।।
---------------------------------------------------------
लंच करे मुसकाय के, छोरी शिव के साथ।
डिनर कराने के लिए, मिल जाते प्रभुनाथ।।
--------------------------------------------------------
कभी श्याम की कार में, बैठे ठगनी धाय।
बाइक पर घूमे कभी, गिरधर को बहलाय।।
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मौज़ करत हैं छोरियां, नाजुक अंग दिखाय।
खाली जेब करा रहीं, अपने जाल फंसाय।।
---------------------------------------------------
बिगड़े छोरा -छोरियां, फैशन में बौराय।
'राज' पूछता आप से, दोषी कौन कहाय।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
कुंडलिया
नेता राजा आज के, जनता प्रजा कहाय।
नेता सुख हैं भोगते, जनता अश्रु बहाय।।
जनता अश्रु बहाय, पीर पर्वत से भारी,
नहीं प्रगति की आस, बढ़े हैं भ्रष्टाचारी।
पिछड़ गया है देश, नहीं है कोई चेता,
रामराज्य की बात, निरर्थक करते नेता।
-राजकुमार धर द्विवेदी
नेता सुख हैं भोगते, जनता अश्रु बहाय।।
जनता अश्रु बहाय, पीर पर्वत से भारी,
नहीं प्रगति की आस, बढ़े हैं भ्रष्टाचारी।
पिछड़ गया है देश, नहीं है कोई चेता,
रामराज्य की बात, निरर्थक करते नेता।
-राजकुमार धर द्विवेदी
नेतन से बच रहियो
साधो, नेतन से बच रहियो।
चुगते नेता हीरा -मोती,
जनता भूखी -प्यासी सोती।
चालन में मत फंसियो,
नेतन से बच रहियो।
-----------------------
नहीं खेलते कच्ची गोटी,
नेतन की चमड़ी है मोटी।
थाह न उनकी पइयो,
नेतन से बच रहियो।
............................
उजली धोती, उजली टोपी,
रोज चाहिए सुंदर गोपी।
रास देख मत हंसियो,
नेतन से बच रहियो।
-------------------------------
जनता की किस्मत है खोटी,
तन पर केवल बची लंगोटी।
कष्ट नहीं अब सहियो,
नेतन से बच रहियो।
-राजकुमार धर द्विवेदी
सोमवार, 3 नवंबर 2014
दो दोहे
भूखे को खाना मिले, प्यासा पाए नीर।
ऐसा राजा चाहिए, हर ले जन की पीर।।
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वादों की खेती करे, जनता को दुख देय।
नेता तिकड़म जानता, झटक वोट वह लेय।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
ऐसा राजा चाहिए, हर ले जन की पीर।।
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वादों की खेती करे, जनता को दुख देय।
नेता तिकड़म जानता, झटक वोट वह लेय।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
याद आता है वह बूढ़ा मशीनमैन
संस्मरण
वह बूढ़ा आदमी मुझे अक्सर याद आता
है। सालों पहले की बात है। तब मैं रीवा के एक अखबार में काम करता था। वहां
एक काफी पुराना मशीनमैन था। मालिक और स्टाफ के लोग उसे बाबा कहते थे। बाबा
खुशमिजाज़ था। वह हंसकर बातें करता था। उसे पान खाने का बेहद शौक था। वह
मुंह में पान का बीड़ा दबाए जुगाली करता रहता था। मालिक अक्सर उस पर
चिल्लाते रहते थे -'बाबा, अभी तक कहां थे ? अखबार कब छापोगे ? काम नहीं
होता तो जाओ घर।' लेकिन बाबा बिना कोई जवाब दिए काम में जुट जाता था। वह
बड़ा ही मेहनती था। बड़ी ही सफाई से छपाई किया करता था।
एक दिन बाबा मुझे रास्ते में मिला। उसका मन खिन्न था। कहने लगा -'मैं काम छोड़ दूंगा। मालिक रोज टोकता रहता है। मेरे सामने फटीचर था। अब चार पैसा आ गया तो घमंडी हो गया है। मैं उसकी बाप की उमर का हूं, लेकिन लिहाज़ नहीं करता। आज तो गाली दे दी उसने। काम की कमी नहीं है। अभी मैं सतना [रीवा का पड़ोसी शहर ] चला जाऊं तो कई जगह काम मिल जाएगा और पैसा भी ज्यादा मिल मिलेगा। अभी मैं जवानों से ज्यादा काम करता हूं। यहां देता है एक हजार और चाहता है कि रात -दिन गुलामी करूं। काम की कद्र नहीं है। बहुत तो सहन किया मैंने। बच्चा मानकर माफ़ किया, लेकिन वह तो बाप बनने की कोशिश करता है। '
बाबा की बात मुझे जंची। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि साठ साल से अधिक उमर में भी बाबा का हौसला बुलंद है। उसका स्वाभिमान तो ज़िंदा है ही, उसे अपनी श्रम-शक्ति पर पूरा भरोसा भी है।
कुछ दिनों बाद पता चला कि बाबा सतना के किसी प्रेस में मशीन चलाने लगा है। उसका वेतन भी दो हजार हो गया है। मालिक को पता चला तो वे भागे -भागे सतना गए और बाबा को मनाकर लाए, उसका वेतन भी बढ़ा दिया। बाबा के बिना उनकी छपाई -व्यवस्था चरमरा गई थी। मालिक को बाबा की कमी खल रही थी। इसके बाद उन्होंने उसका कभी अपमान नहीं किया, उसके काम का सम्मान किया।
एक -दो साल बाबा की मौत हो गई, लेकिन वह मेरे अंदर ज़िंदा है। कई बार मुझे भी विपरीत परिस्थितियों में नौकरी छोड़नी पड़ी। उस स्थिति में बाबा की सीख काम आई। निराश होने के बजाय मैंने आगे कदम बढ़ाया है और आशातीत सफलता भी मिली है। अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए श्रम की पूजा करने वाले की अभी हार नहीं होती।
-राजकुमार धर द्विवेदी
एक दिन बाबा मुझे रास्ते में मिला। उसका मन खिन्न था। कहने लगा -'मैं काम छोड़ दूंगा। मालिक रोज टोकता रहता है। मेरे सामने फटीचर था। अब चार पैसा आ गया तो घमंडी हो गया है। मैं उसकी बाप की उमर का हूं, लेकिन लिहाज़ नहीं करता। आज तो गाली दे दी उसने। काम की कमी नहीं है। अभी मैं सतना [रीवा का पड़ोसी शहर ] चला जाऊं तो कई जगह काम मिल जाएगा और पैसा भी ज्यादा मिल मिलेगा। अभी मैं जवानों से ज्यादा काम करता हूं। यहां देता है एक हजार और चाहता है कि रात -दिन गुलामी करूं। काम की कद्र नहीं है। बहुत तो सहन किया मैंने। बच्चा मानकर माफ़ किया, लेकिन वह तो बाप बनने की कोशिश करता है। '
बाबा की बात मुझे जंची। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि साठ साल से अधिक उमर में भी बाबा का हौसला बुलंद है। उसका स्वाभिमान तो ज़िंदा है ही, उसे अपनी श्रम-शक्ति पर पूरा भरोसा भी है।
कुछ दिनों बाद पता चला कि बाबा सतना के किसी प्रेस में मशीन चलाने लगा है। उसका वेतन भी दो हजार हो गया है। मालिक को पता चला तो वे भागे -भागे सतना गए और बाबा को मनाकर लाए, उसका वेतन भी बढ़ा दिया। बाबा के बिना उनकी छपाई -व्यवस्था चरमरा गई थी। मालिक को बाबा की कमी खल रही थी। इसके बाद उन्होंने उसका कभी अपमान नहीं किया, उसके काम का सम्मान किया।
एक -दो साल बाबा की मौत हो गई, लेकिन वह मेरे अंदर ज़िंदा है। कई बार मुझे भी विपरीत परिस्थितियों में नौकरी छोड़नी पड़ी। उस स्थिति में बाबा की सीख काम आई। निराश होने के बजाय मैंने आगे कदम बढ़ाया है और आशातीत सफलता भी मिली है। अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए श्रम की पूजा करने वाले की अभी हार नहीं होती।
-राजकुमार धर द्विवेदी
रावण -कुछ दोहे
भुजा बीस, दस शीश थे, बल -विद्या भरपूर।
मिला दशानन खाक में, रहा दंभ से चूर।।
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द्रोह राम से जो करे, रावण -सी गत होय।
सर्वनाश होकर रहे, कुल में बचे न कोय।।
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अपने देश-समाज में, जगह-जगह लंकेश।
कोई खल के रूप में, कोई मुनि के वेश।।
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जगत पुकारे आपको, कहां राम हैं आप।
सत्य -सती सिसकें यहां, बढ़ा धरा पर पाप।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
मिला दशानन खाक में, रहा दंभ से चूर।।
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द्रोह राम से जो करे, रावण -सी गत होय।
सर्वनाश होकर रहे, कुल में बचे न कोय।।
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अपने देश-समाज में, जगह-जगह लंकेश।
कोई खल के रूप में, कोई मुनि के वेश।।
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जगत पुकारे आपको, कहां राम हैं आप।
सत्य -सती सिसकें यहां, बढ़ा धरा पर पाप।।
-राजकुमार धर द्विवेदी
बोलिए आयोजक की जय --------
सालों पहले मैं अखिल भारतीय कहे जाने वाले
एक कवि -सम्मेलन में बतौर श्रोता शरीक हुआ। मंच पर नामी कवि विराजमान थे।
उनकी कविताएं तो ठीक ही थीं, लेकिन जो बात खली, उसे यहां शेयर कर रहा हूं।
कार्यक्रम का आयोजक दो कौड़ी का आदमी था। साहित्य का वह 'ककहरा' भी ठीक से
नहीं जानता था, लेकिन चाटुकारिता में माहिर था। धनाढ्यों को पटा कर, खूब
चंदा वसूली करके आयोजन कर लेता था। मैंने देखा कि मंचासीन सभी बड़े कवि उस
दो कौड़ी के आयोजक की जम कर तारीफ कर रहे थे। उसे साहित्य का न जाने क्या
-क्या बना दिया गया था। उस पर कविताएं लुटाई जा रही थीं। कविगण खुद को
धन्य मान रहे थे कि उन्हें आयोजक ने इतना बड़ा मंच दिया। लग रहा था कि वह
आयोजक नहीं, भगवान है। कवयित्रियां भी धन्य हो रही थीं। उस पर इश्क की
रचनाएं न्योछावर कर रही थीं। ज्यादा देर तक वहां बैठे नहीं रहा गया। आजकल
अच्छा कवि होना जरूरी नहीं है। आज आप आयोजक बन जाइए, आयोजन कराने लगिए, बड़े
कवि मान लिए जाएंगे। आप लल्लूलाल को बुलाइए, लल्लूलाल आपको बुलाएंगे। ऐसे
ही लोग आज छाए हुए हैं। कविता के नाम पर फूहड़ता। अच्छी कविताएं गायब।
अच्छे साहित्य की वाचिक परंपरा को कायम रखने के लिए काव्य -गोष्ठियां की
जानी चाहिए। उनमें आसपास के सुधी श्रोताओं को बुलाएं। जब लोग गोष्ठियों से
जुड़ेंगे तो एक दिन बड़ा और स्वस्थ कवि -सम्मेलन हो सकता है।
-राजकुमार धर द्विवेदी
-राजकुमार धर द्विवेदी
सिपाही ने जब जीत लिया दिल
शाम का समय था। मैं अपने शहर के गार्डन में
बैठा था। उसी दौरान सात -आठ किशोरियों का ग्रुप गुजरा। हमारे आसपास बैठे
लोगों ने किशोरियों की मस्ती देखकर प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। कई
बूढ़ों ने कहा -' देखो, इन लड़कियों को-------क्या ज़माना आ गया है। कोई लाज
-शर्म नहीं। ये फैशन ले डूबेगा। हमारे ज़माने में मान-मर्यादा का ख्याल रखा
जाता था। ' गार्डन की सुरक्षा में तैनात एक सिपाही ने बुजुर्गों की यह बात
सुनकर कहा -'ये अभी बच्चियां हैं। क्या इन्हें हंसने -बोलने, खुशी मनाने का
हक़ नहीं है ? क्या बुरा कर रही हैं ये ? अपने में मस्त हैं। आप सबको तो
खुश होना चाहिए इन्हें देखकर।' पुलिस से हम ऐसे नेक विचार की उम्मीद नहीं
करते। मुझे उस पुलिस जवान के मुंह से ऐसी बात सुनकर बहुत अच्छा लगा और उन
बुजुर्गों पर बेहद गुस्सा आया, जो सिर्फ अपने ज़माने का राग अलापते हुए
बेतुकी बातें कर रहे थे। हां, यह सच है कि बच्चों को अति छूट देने के कारण
वे बिगड़ गए हैं। कई तो सारी मर्यादाएं ही लांघ जाते हैं, लेकिन यह हम पर
निर्भर करता है कि उन्हें कितनी छूट दें और कितना उन पर नियंत्रण रखें।
बच्चों को ज्यादा दबाना भी ठीक नहीं और खुली छूट देना तो बहुत ही गलत है।
उन्हें खुली हवा में सांस लेने दें, तभी वे कुछ कर पाएंगे। ये जो बेड़ियां
हम लगाते हैं, उन्हें हर बात पर गलत साबित करते हैं, ऐसा करके हम अपनी नई
पौध की जड़ में खाद -पानी नहीं, बल्कि ज़हर डालते हैं। क्या ज़माना था पुराना ?
मैं ऐसे कई बुजुर्गों को देखता हूं , जो अपनी उम्र का लिहाज़ न करते हुए
बच्चियों तक को घूरते रहते हैं। ज़माना हमसे है , हम ज़माने से नहीं। बच्चों
को अच्छा माहौल दें, उनके दोस्त बनें, उनमें कमियां ही न निकालें, उनकी
अच्छाइयों को सराहें भी। कहीं कुछ बुरा देखें तो प्यार से समझाएं। इससे आप
नई पीढ़ी के बीच आदरणीय बने रहेंगे।
-राजकुमार धर द्विवेदी
-राजकुमार धर द्विवेदी
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