बिना किसी कारण मैंने अपने गुरुदेव पंडित अरुण चौबे जी महाराज के पास जाना बंद कर दिया था। एक साल तक नहीं गया, लेकिन उनका स्मरण हमेशा रहता था। अभी एक दिन नहाने के बाद जैसे ही हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया, वैसे ही इच्छा बलवती हो गई कि आज गुरुदेव के पास जाना है। पूजा-पाठ करके चल पड़ा। गुरुदेव के आश्रम में पहुंचा तो वे मुझे देखकर बेहद खुश हुए और दिल से आशीर्वाद बरसाने लगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा -'आप बहुत दिनों के बाद आए। एक साल अठारह दिन बाद।' यह सुनकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि गुरुदेव ने मेरी गैरमौजूदगी का पूरा ब्यौरा याद कर रखा है। मेरे एक गुरु भाई ने कहा -'गुरूजी आपको हमेशा याद किया करते थे। कोई त्योहार पड़ता था तो आपका इंतज़ार किया करते थे। यह सुनकर मुझे बेहद अफसोस हुआ। मैंने गुरुदेव के पैर पकड़ कर क्षमा मांगी। वे हंसने लगे और बोले -'कोई बात नहीं। हो जाता है कभी -कभी। आप आते हैं तो अच्छा लगता है। आया कीजिए। ' मैंने उन्हें आते रहने का वचन दिया। कुछ देर तक मैं वहां बैठा। बहुत अच्छा लगा। बड़ी संख्या में लोग थे। गुरुदेव उनकी समस्याओं का निदान कर रहे थे। कई बातें मैंने भी सीखीं। मैं वहां से ऊर्जा लेकर लौटा। सारी थकान और पीड़ा दूर हो गई।
इस स्वार्थी दुनिया में कौन, किसको याद रखता है? मतलब है तो राम-राम, काम निकल गया तो भूल गए। लेकिन माता -पिता और सच्चे गुरु कभी नहीं भूलते। मेरी मां को भी एक -एक दिन याद रहता है। गुरुदेव ने जब 'एक साल अठारह दिन' कहा तो मां की याद आई और लगा कि गुरु और मां समान ही हैं। मुझे अपनी गलती पर अभी तक पछतावा है। ऐसे गुरु विरले ही हैं। लूटने वाले कई मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे गुरु कहां , जो बिना किसी स्वार्थ के अपने शिष्यों को याद रखते हैं ?
-राजकुमार धर द्विवेदी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें