बुधवार, 5 नवंबर 2014

अब तो अपने गांव में


केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में,
चालें, तिकड़म , तोड़फोड़ ही अब तो अपने गांव में .
नदिया सूखी, पोखर खाली, गंदा पानी ताल में,
सूखी फसलें, रोती जनता, कुछ तो काला दाल में .
बरगद की छाया को तरसें अब तो अपने गांव में,
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में.
-----------------------------------------------------
नेता -अफसर मौज उड़ाते, जनता फंसती जाल में,
नहीं तरक्की लिखी हुई है, कहती अम्मां भाल में .
रामराज्य का राग अलापें ठगुआ अपने गांव में ,
केवल धुआं, धूल है, राखड अब तो अपने गांव में.
-राजकुमार धर द्विवेदी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें