सत्रह साल बाद भाई हरिहर तिवारी जी के साथ
भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .भाभी जी को भलीभांति मालूम है कि मुझे
खाने में क्या पसंद है .मनपसंद खाना और स्नेह ----बात करते -करते खूब खा
गया .वाकई यही प्रीतिभोज है, जिसकी मिठास कभी कम नहीं हो सकती .मुझे अच्छी
तरह जानने वाले लोग यह जानते हैं कि मैं बहुत ही कम लोगों के घर जाता हूं
.खाना तो ऐसे ही आत्मीय जनों के यहां खाता हूं . खाना तो कहीं भी मिल
जाएगा, लेकिन ऐसा स्नेह दुर्लभ है .

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