सोमवार, 3 नवंबर 2014

रावण -कुछ दोहे

भुजा बीस,  दस शीश थे, बल -विद्या भरपूर।
मिला दशानन खाक में, रहा दंभ से चूर।।
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द्रोह राम से जो करे,  रावण -सी गत होय।
सर्वनाश होकर रहे,  कुल में बचे न कोय।।
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अपने देश-समाज में,  जगह-जगह लंकेश।
कोई खल के रूप में,  कोई मुनि के वेश।।
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जगत पुकारे आपको,  कहां राम हैं आप।
सत्य -सती सिसकें यहां, बढ़ा धरा पर पाप।।

-राजकुमार धर द्विवेदी

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