सालों पहले मैं अखिल भारतीय कहे जाने वाले
एक कवि -सम्मेलन में बतौर श्रोता शरीक हुआ। मंच पर नामी कवि विराजमान थे।
उनकी कविताएं तो ठीक ही थीं, लेकिन जो बात खली, उसे यहां शेयर कर रहा हूं।
कार्यक्रम का आयोजक दो कौड़ी का आदमी था। साहित्य का वह 'ककहरा' भी ठीक से
नहीं जानता था, लेकिन चाटुकारिता में माहिर था। धनाढ्यों को पटा कर, खूब
चंदा वसूली करके आयोजन कर लेता था। मैंने देखा कि मंचासीन सभी बड़े कवि उस
दो कौड़ी के आयोजक की जम कर तारीफ कर रहे थे। उसे साहित्य का न जाने क्या
-क्या बना दिया गया था। उस पर कविताएं लुटाई जा रही थीं। कविगण खुद को
धन्य मान रहे थे कि उन्हें आयोजक ने इतना बड़ा मंच दिया। लग रहा था कि वह
आयोजक नहीं, भगवान है। कवयित्रियां भी धन्य हो रही थीं। उस पर इश्क की
रचनाएं न्योछावर कर रही थीं। ज्यादा देर तक वहां बैठे नहीं रहा गया। आजकल
अच्छा कवि होना जरूरी नहीं है। आज आप आयोजक बन जाइए, आयोजन कराने लगिए, बड़े
कवि मान लिए जाएंगे। आप लल्लूलाल को बुलाइए, लल्लूलाल आपको बुलाएंगे। ऐसे
ही लोग आज छाए हुए हैं। कविता के नाम पर फूहड़ता। अच्छी कविताएं गायब।
अच्छे साहित्य की वाचिक परंपरा को कायम रखने के लिए काव्य -गोष्ठियां की
जानी चाहिए। उनमें आसपास के सुधी श्रोताओं को बुलाएं। जब लोग गोष्ठियों से
जुड़ेंगे तो एक दिन बड़ा और स्वस्थ कवि -सम्मेलन हो सकता है।
-राजकुमार धर द्विवेदी
-राजकुमार धर द्विवेदी
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