संस्मरण
वह बूढ़ा आदमी मुझे अक्सर याद आता
है। सालों पहले की बात है। तब मैं रीवा के एक अखबार में काम करता था। वहां
एक काफी पुराना मशीनमैन था। मालिक और स्टाफ के लोग उसे बाबा कहते थे। बाबा
खुशमिजाज़ था। वह हंसकर बातें करता था। उसे पान खाने का बेहद शौक था। वह
मुंह में पान का बीड़ा दबाए जुगाली करता रहता था। मालिक अक्सर उस पर
चिल्लाते रहते थे -'बाबा, अभी तक कहां थे ? अखबार कब छापोगे ? काम नहीं
होता तो जाओ घर।' लेकिन बाबा बिना कोई जवाब दिए काम में जुट जाता था। वह
बड़ा ही मेहनती था। बड़ी ही सफाई से छपाई किया करता था।
एक दिन बाबा मुझे रास्ते में मिला। उसका मन खिन्न था। कहने लगा -'मैं काम छोड़ दूंगा। मालिक रोज टोकता रहता है। मेरे सामने फटीचर था। अब चार पैसा आ गया तो घमंडी हो गया है। मैं उसकी बाप की उमर का हूं, लेकिन लिहाज़ नहीं करता। आज तो गाली दे दी उसने। काम की कमी नहीं है। अभी मैं सतना [रीवा का पड़ोसी शहर ] चला जाऊं तो कई जगह काम मिल जाएगा और पैसा भी ज्यादा मिल मिलेगा। अभी मैं जवानों से ज्यादा काम करता हूं। यहां देता है एक हजार और चाहता है कि रात -दिन गुलामी करूं। काम की कद्र नहीं है। बहुत तो सहन किया मैंने। बच्चा मानकर माफ़ किया, लेकिन वह तो बाप बनने की कोशिश करता है। '
बाबा की बात मुझे जंची। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि साठ साल से अधिक उमर में भी बाबा का हौसला बुलंद है। उसका स्वाभिमान तो ज़िंदा है ही, उसे अपनी श्रम-शक्ति पर पूरा भरोसा भी है।
कुछ दिनों बाद पता चला कि बाबा सतना के किसी प्रेस में मशीन चलाने लगा है। उसका वेतन भी दो हजार हो गया है। मालिक को पता चला तो वे भागे -भागे सतना गए और बाबा को मनाकर लाए, उसका वेतन भी बढ़ा दिया। बाबा के बिना उनकी छपाई -व्यवस्था चरमरा गई थी। मालिक को बाबा की कमी खल रही थी। इसके बाद उन्होंने उसका कभी अपमान नहीं किया, उसके काम का सम्मान किया।
एक -दो साल बाबा की मौत हो गई, लेकिन वह मेरे अंदर ज़िंदा है। कई बार मुझे भी विपरीत परिस्थितियों में नौकरी छोड़नी पड़ी। उस स्थिति में बाबा की सीख काम आई। निराश होने के बजाय मैंने आगे कदम बढ़ाया है और आशातीत सफलता भी मिली है। अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए श्रम की पूजा करने वाले की अभी हार नहीं होती।
-राजकुमार धर द्विवेदी
एक दिन बाबा मुझे रास्ते में मिला। उसका मन खिन्न था। कहने लगा -'मैं काम छोड़ दूंगा। मालिक रोज टोकता रहता है। मेरे सामने फटीचर था। अब चार पैसा आ गया तो घमंडी हो गया है। मैं उसकी बाप की उमर का हूं, लेकिन लिहाज़ नहीं करता। आज तो गाली दे दी उसने। काम की कमी नहीं है। अभी मैं सतना [रीवा का पड़ोसी शहर ] चला जाऊं तो कई जगह काम मिल जाएगा और पैसा भी ज्यादा मिल मिलेगा। अभी मैं जवानों से ज्यादा काम करता हूं। यहां देता है एक हजार और चाहता है कि रात -दिन गुलामी करूं। काम की कद्र नहीं है। बहुत तो सहन किया मैंने। बच्चा मानकर माफ़ किया, लेकिन वह तो बाप बनने की कोशिश करता है। '
बाबा की बात मुझे जंची। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि साठ साल से अधिक उमर में भी बाबा का हौसला बुलंद है। उसका स्वाभिमान तो ज़िंदा है ही, उसे अपनी श्रम-शक्ति पर पूरा भरोसा भी है।
कुछ दिनों बाद पता चला कि बाबा सतना के किसी प्रेस में मशीन चलाने लगा है। उसका वेतन भी दो हजार हो गया है। मालिक को पता चला तो वे भागे -भागे सतना गए और बाबा को मनाकर लाए, उसका वेतन भी बढ़ा दिया। बाबा के बिना उनकी छपाई -व्यवस्था चरमरा गई थी। मालिक को बाबा की कमी खल रही थी। इसके बाद उन्होंने उसका कभी अपमान नहीं किया, उसके काम का सम्मान किया।
एक -दो साल बाबा की मौत हो गई, लेकिन वह मेरे अंदर ज़िंदा है। कई बार मुझे भी विपरीत परिस्थितियों में नौकरी छोड़नी पड़ी। उस स्थिति में बाबा की सीख काम आई। निराश होने के बजाय मैंने आगे कदम बढ़ाया है और आशातीत सफलता भी मिली है। अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए श्रम की पूजा करने वाले की अभी हार नहीं होती।
-राजकुमार धर द्विवेदी
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