जल अमृत-तुल्य, इसे बचाएं
-राजकुमार धर द्विवेदी
गर्मी के दिन आने वाले हैं। इस मौसम में तमाम जलाभाव हो जाता है। बूंद-बूंद पानी के लिए लोग परेशान होते हैं। चौबीसों घंटे पानी की चिंता बनी रहती है। लेकिन जो लोग दूरदर्शी होते हैं, वे संकट आने के पूर्व ही सजग रहते हैं। इस तरह वे विषम स्थिति में खुद को उबार लेते हैं। संत रहीम ने बहुत पहले पानी के लिए सतर्क कर दिया था। उन्होंने लिखा- 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरें मोती, मानुष, चून।'' अगर संत से लोगों ने सीख ग्रहण की होती तो पानी के लिए इतनी परेशानी क्यों होती?
एक माह पूर्व की बात है। एक मित्र के यहां से गृह प्रवेश का निमंत्रण आया था। मैं सपरिवार मित्र के घर पहुंच गया। पूजा-पाठ, भोजन आदि करते हुए रात के नौ बज गए। घर पहुंच कर जब पीने के पानी के लिए बाल्टी देखी तो वह खाली थी। घर की चार बाल्टियों में से सिर्फ एक बाल्टी आधी भरी हुई ही। सुबह जाने की जल्दी में पानी भरना भूल गए थे तथा रात में जब तक घर आए, नल जा चुका था। चूंकि रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए पड़ोसियों के यहां भी पानी लेने नहीं जा सकते थे। अब तय यह हुआ कि आधी बाल्टी पानी से ही रात गुजारी जाए। इस भीषण गर्मी में आठ लोगों के लिए पानी पर्याप्त नहीं था, लेकिन इसके अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं था।
इन आठ लोगों में से तीन मेरे मामा के लड़के थे, जो गर्मी की छुट्टियों में हमारे घर आए हुए थे। पानी पीते समय वे पीते कम और फेंकते ज्यादा थे। गांव में उनका खुद का बोर है। प्यास लगते ही बोर चालू कर पानी पीते और काफी मात्रा में पानी व्यर्थ बहा देते। लेकिन अब संकट के समय उन्हें एक-एक बूंद का महत्व समझते देखकर मेरी प्यास बुझ रही थी।
मैंने उनसे पूछा, "क्या अब भी वापस जाकर पानी की बर्बादी करोगे?"
वे एक स्वर में बोले, "आज की रात का सबक उन सभी संदेशों से बढ़कर है, जो हमने आज तक देखा, सुना या पढ़ा है। पानी की इस क्षणिक समस्या ने उस गंभीर भविष्य का बोध करा दिया, जिसके बारे में हम सभी जानते हैं, लेकिन जागरूक तथा सतर्क बहुत कम लोग हैं।"
सुरक्षित जल आपूर्ति एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था का आधार होती है, पर फिर भी दुर्भाग्यवश विश्व स्तर पर इसे प्रमुखता नहीं दी गई है। जब भी जल और वायु के बिना जीवन की बात होती है तो कहते हैं कि जल के बिना कुछ हफ्ते जीवित रह सकते हैं, लेकिन हवा के बिना सिर्फ कुछ मिनट। जल संकट दुनिया के देशों की प्राथमिकता में शुमार नहीं रहा। शायद यही कारण है कि हम ऐसे आसन्न संकट की ओर बढ़ रहे हैं, जो मानव अस्तित्व के लिए चुनौती प्रस्तुत कर रहा है।
पृथ्वी पर लगभग 71 प्रतिशत पानी है, लेकिन उसमें से भी केवल तीन प्रतिशत पीने योग्य है। एक अनुमान के अनुसार जल से होने वाले रोगों के लिए भारत पर प्रति वर्ष लगभग 42 अरब रुपये का आर्थिक बोझ है। भारत में 50 प्रतिशत से भी कम आबादी के पास पीने का सुरक्षित पानी उपलब्ध है। छत्तीसगढ़ के सुपेबेड़ा में फ्लोराइड और आर्सेनिक से दूषित जल के कारण लोग किडनी से संबंधित बीमारी के शिकार हो रहे हैं और असमय काल के ग्रास बन रहे हैं।
अब मानसून आ चुका है। प्रकृति से हमें वर्षा के माध्यम से असीमित जल भंडार मिलेगा, जिसे अपने उपयोग के लिए ज्यादा से ज्यादा संचित करना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए जल शक्ति मंत्रालय ने 29 मार्च, 2022 से 30 नवंबर, 2022 की अवधि के लिए जल शक्ति अभियान: कैच द रेन अभियान 2022 प्रारंभ किया है।
जल के मामले में हमें दूसरों की गलतियों से सीखना है, न कि खुद गलती करके। इस अमूल्य संपदा की हानि के परिणाम कितने विनाशकारी होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत विश्व के उन देशों में आता है, जो जल संकट का सामना कर रहे हैं। 'जल है तो कल है' इसके मायने समय के साथ और गम्भीर हुए हैं, इसलिए अब जल को देवता मानकर सारी जिम्मेदारी उन पर न डाल कर, जल को एक संसाधन के रूप में समझने की जरूरत है। जल का संरक्षण, संचयन और निरंतरता बनाए रखने के लिए सभी को आगे आना होगा।
-राजकुमार धर द्विवेदी
एफ-8, आनंद विहार, प्राकृतिक चिकित्सालय के पास, आनंद नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)। पिनकोड-492001
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