संस्मरणसालों पहले की बात है। भोपाल में मैं एक सज्जन के घर गया था। हाल ही में उनसे परिचय हुआ था। यहां -वहां की बातें हो रही थीं। उसी बीच उन सज्जन की पत्नी ने उन्हें बताया -'पड़ोस में एक देहाती -परिवार रहने आ गया है। आदमी ट्रक चलाता है, औरत कामवाली बाई है। उनके बच्चे बड़े गंदे हैं। मुझे बड़ी चिंता हो रही है कि उनके बच्चों की संगति में अपने बच्चे कहीं बिगड़ जाएं।'
सज्जन ने तत्काल अपने नए पड़ोसी यानी ट्रक ड्राइवर को बुलाकर हड़काया -'देखो भाई, मैं अपने घर में कहीं ताला नहीं लगाता। अगर मेरा कोई सामान चोरी गया तो ठीक नहीं होगा।'
यह मुझे कतई अच्छा नहीं लगा। ट्रकवाले ने खुद को बहुत ही अपमानित महसूस किया। बुलाने पर वह दौड़ते हुए आया था। बहुत ही सलीके से हम सभी से नमस्कार किया था। उसने कहा -'आप कैसी बात कर रहे हैं, साहब ? हम चोर -चकार नहीं हैं। गांव में बच्चे ठीक से पढ़ते -लिखते नहीं थे, इसलिए परिवार शहर लाया हूं आप अच्छे लोगों के बीच। मेहनत -मजदूरी करके बच्चों को लायक बनाना है। आप चिंता न करें। हम गरीब भले ही हैं, लेकिन परिवार को अच्छे संस्कार दिए हैं। हम आपकी किसी चीज की ओर देखेंगे तक नहीं।'
यह कह कर ट्रक ड्राइवर चला गया। उसके जाने के बाद मैं भी वहां ज्यादा देर तक नहीं बैठ सका। उस कथित अच्छे परिवार से मुझे घृणा हो गई। दरअसल वे सज्जन मेरे संस्थान में काम पाना चाहते थे, इसलिए मेरी खुशामद कर रहे थे। खिलाने -पिलाने के लिए घर ले गए थे। वे सरकारी नौकरी में थे , लेकिन घपलेबाजी में निलंबित थे। आय कम हो गई थी , इसलिए चाहते थे कि प्रेस में ही कोई काम मिल जाए। मैंने सोचा कि ऐसी सोच वाले आदमी की मैं कतई सिफारिश नहीं करूंगा। उन्हें मेरे संस्थान में काम नहीं मिला। मैंने प्रबंधन से उस ड्राइवर वाली घटना का जिक्र किया तो उस सज्जन के लिए प्रेस का दरवाजा बंद हो गया।
उस कॉलोनी में मेरे एक सहयोगी रह चुके थे। वे कहने लगे -'उस ट्रक ड्राइवर से कहिए कि वह वहां से चला जाए। वहां उसके बाल-बच्चे बिगड़ जाएंगे। वहां बड़े -बड़े भ्रष्टाचारी रहते हैं। उनके चरित्र को मैं अच्छी तरह जानता हूं। जैसा खुद को दिखाने की कोशिश करते हैं , वैसे हैं नहीं। बड़े -बड़े घोटाले करके बैठे हैं। क्या नहीं होता वहां ? वहीं से कुछ दिनों पहले चार कॉल गर्ल्स पकड़ी गई थीं। कॉलोनी की कुछ महिलाएं भी धंधा कराती हैं। एक गरीब रहने गया तो उसे भगाने पर तुल गए।'
सालों पहले की बात मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। उस ट्रक ड्राइवर का चेहरा मुझे अक्सर याद आ जाता है। खुद को अच्छा मानने वाले लोगों की यह कैसी अच्छाई है ? क्या भौतिक सुख -सुविधाएं पा लेना ही सब कुछ है ? जिनमें अच्छे संस्कार का बीजारोपण नहीं हुआ, वे चाहे दौलत का पहाड़ खड़ा कर लें, पिछड़े ही कहलाएंगे।
-राजकुमार धर द्विवेदी
नि:संदेह दौलत की पहाड़ पर चढ़े लोग जरूरी नहीं कि अच्छे हों और उस कथित उच्च वर्ग द्वारा संबोधित देहाती-गंदे या छोटे लोग बुरे हों। आपने बिलकुल सही कहा कि इंसान की अच्छाई उसके संस्कार से हैं, धन-संपत्ति से नहीं। मानवता या इंसानियत से जिनका कोई सरोकार नहीं, ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए जैसा कि आपने किया। हृदय को झंकृत करने वाले संस्मरण के लिए आपको सादर नमन आदरणीय राजकुमार धर द्विवेदी जी।
जवाब देंहटाएंबहुत सही बात कही आपने , आदरणीय ललित जी। खूबसूरत समीक्षा के लिए हार्दिक आभार।
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