सोमवार, 15 दिसंबर 2014

तरक्की ?


क्यों नहीं तरक्की हुई है ?
खूब हुई है।
पहले हम लगाते थे ठप्पा
और अब दबाने लगे हैं
वोटिंग मशीन का बटन।
खूब चमत्कार भी हुआ है,
जिन्हें नाक पोंछना नहीं आता था,
उन्हें सरकार चलाना आ गया
और उन्होंने छू लिया
अकूत दौलत का आसमान।
आ गया उन्हें
लक्ष्मी को कैद करने का इल्म।
लेकिन हम ?
तेजी से बढ़ती दुनिया से काफी पीछे हैं,
समस्याओं के अम्बार के बीच।
समस्या ओढ़ते हैं, उसे ही बिछाते हैं,
नेताओं को कोसते हैं,
लेकिन वोटिंग मशीन का बटन
दबाते समय
कुछ नहीं सोचते हैं।
तभी तो हमारे हिस्से का सूरज
उनके घर उगता है,
चांद उनके बेडरूम में कलाएं दिखाता है,
कलियां उनके आगोश में खिलती हैं।
हमारे हिस्से में घुप्प अंधेरा और
मुर्दानगी,
हमारी वजह से।
-राजकुमार धर द्विवेदी

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