मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

अब चरण पकड़ अविनाशी के ----



अब चरण पकड़ अविनाशी के , तू मूरख भटक नहीं जग में,
रख मन में प्रभु का ध्यान सदा, तू माया झपट नहीं जग में।
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सुंदर काया नर -नारी की, क्षण भंगुर है, दुखदायक है,
तू मोहपाश में क्यों फंसता, आसक्ति नहीं फलदायक है।
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प्रभुधाम पहुंच, कुछ कर ऐसा, तू नाहक लटक नहीं जग में,
अब चरण पकड़ अविनाशी के , तू मूरख भटक नहीं जग में।
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सत्कर्म छोड़ आडंबर में, क्यों पाप इकट्ठा करता है,
करता तू क्यों दुष्कर्म सदा, क्यों नहीं नाथ से डरता है?
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यह बार -बार समझाइश है, कर सेवा, खटक नहीं जग में,
अब चरण पकड़ अविनाशी के , तू मूरख भटक नहीं जग में।
-राजकुमार धर द्विवेदी

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