अति बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदी रामपाल काका को जेल से रिहा कर दिया गया। जेल अधीक्षक ने कहा, ''जाओ, राम-भजन करो। जीवन के बचे कुछ दिन परिवार के साथ गुजार लो।"
रामपाल काका घर आ गए। सालों बाद परिवार के सभी लोगों को एकसाथ देखकर उन्हें खुशी हुई। गांव के लोग भी मिलने आने लगे। काका 90 साल के थे। गांव में उनकी उमर के दो लोग ही बचे थे-रामशरण और जगन्नाथ । उन लोगों से दो-चार साल छोटी काकी थी।
रामशरण और जगन्नाथ , काका से मिलने आए। उनसे मिलकर रामपाल काका को पुराने दिन याद आ गए। पुराने दिनों को यादकर रामशरण और जगन्नाथ देर तक बातें करते रहे। काका कभी हंस देते तो कभी गंभीर हो जाते। बीमारी के कारण वे ज्यादा बोल नहीं पा रहे थे।
रामपाल काका नामी पहलवान थे। घर में खाने-पीने की कोई कमी न थी। एक भैंस का वे अकेले दूध पी जाया करते थे। अच्छा शरीर बना था उनका। बड़े-बड़े पहलवानों को छठी का दूध याद दिला देते थे। लेकिन कभी किसी कमजोर को नहीं सताते थे। अगर कोई आदमी किसी कमजोर को तंग करता था तो वे उस दुष्ट की धुनाई करते थे। वे बड़े-बुजुर्गों का आदर और बराबरी व छोटी उम्र के लोगों को भरपूर स्नेह करते थे। महिलाओं का तो वे बहुत ही सम्मान करते थे। रिश्ते का बराबर ख्याल रखते थे। क्या मजाल कि उनके रहते कोई आदमी किसी महिला या लड़की से अभद्रता कर दे।
सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि अचानक काका के बुरे दिन आ गए। एक गुंडे ने गांव की किसी युवती को वसंत पंचमी के मेले में छेड़ दिया। काका भी मेला करने गए थे। उन्हें पता चला तो उन्होंने गुंडे को फटकार लगाई। लेकिन वह उनसे भिड़ गया और युवती को उठा ले जाने की धमकी दे डाली। दरअसल वह इलाके का नामी गुंडा था। चूंकि उसके चाचा रामसजीवन विधायक थे, इसलिए वह किसी से खौफ नहीं खाता था। वह दुराचारी बहन-बेटियों की इज्जत के साथ खेलता था। डर के कारण लोग उसका अत्याचार सह रहे थे। लेकिन काका को सहन नहीं हुआ। उन्होंने उसकी जमकर धुनाई की। इतना मारा कि वह खून की उल्टियां करने लगा। अस्पताल ले जाते-जाते उसकी मौत हो गई।
एक दुराचारी के अंत से लोगों ने चैन की सांस ली, लेकिन किसी ने खुलकर खुशी नहीं मनाई, क्योंकि विधायक का डर था। विधायक ने काका को गुंडों और पुलिस से जमकर पिटवाया। काका के खिलाफ उसने अपनी पहुंच का पूरा इस्तेमाल किया। काका जेल में ठंूस दिए गए। मुकदमा चला। विधायक के दबाव में कई लोगों ने काका के खिलाफ गवाही दी। यहां तक कि उन्हें कुख्यात गुंडा-बदमाश तक बताया गया। विधायक के लाख चाहने के बावजूद उन्हें फांसी तो नहीं हुई, लेकिन आजीवन कारावास की सजा जरूर सुना दी गई।
जब काका को सजा हुई थी, तब उनके दोनों बेटे सुखलाल और रामदयाल छोटे-छोटे थे। काकी दुनियादारी बिलकुल नहीं जानती थीं। लग रहा था कि गृहस्थी नहीं चल पाएगी। कौन खेती कराएगा, कौन बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करेगा? उधर विधायक का भी डर बना हुआ था कि वह कहीं बच्चों को मरवा न डाले। लेकिन गांव के लोग काका के परिवार के साथ थे। काका के बालसखा रामशरण और जगन्नाथ खास तौर पर आगे आए और उन्होंने विधायक का मुखर विरोध किया। उसे गांव में घुसने तक नहीं दिया जाता था। गांव का कोई भी आदमी उसे वोट नहीं देता था। बाद में तो उसकी राजनीति ही खत्म हो गई।
काका की कमी गांव के लोगों को सालों खलती रही। लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता गया, वैसे-वैसे लोग उन्हें भूलते गए। नई पीढ़ी को उनसे लगाव नहीं रह गया।
बच्चों की शादी में काका गांव आए थे। इसके बाद कभी नहीं आए। जेल ही जैसे उनका घर हो गया हो। जेल में उनका आचरण बहुत अच्छा था। वहां के अधिकारी -कर्मचारी उनके व्यवहार से खुश थे। कैदियों के बीच भी उनकी इज्जत थी। सभी जानते थे कि वे एक दुराचारी को मारकर आए हैं।
काका जेल में कई हुनर सीख गए थे। उन्हें भजन गाना बचपन से पसंद था। वहां वे मंगलवार और शनिवार को रामचरित मानस का पाठ करते थे। कैदियों को भगवान की कथा सुनाते थे। कथा कहते-कहते, दोहा-चौपाई गाते-गाते उन्होंने हारमोनियम और ढोलक बजाना भी सीख लिया था। वे काम करने में भी पीछे नहीं रहा करते थे। जो भी काम उन्हें सौंपा जाता, उसे वे पूरी ईमानदारी और मेहनत से करते।
काकी और बच्चे उनसे मिलने आया करते थे। एक लड़का शिक्षक और दूसरा पटवारी बन गया था। दोनों के बाल-बच्चे थे। वे बच्चे भी काफी बड़े हो गए थे। उनका भी शादी-ब्याह हो गया था। वे भी बाल-बच्चेदार हो गए थे।
काका को उम्मीद नहीं थी कि वे कभी जेल से छूटेंगे और गांव की खुली हवा में सांस लेंगे। उनकी ऐसी कोई इच्छा भी नहीं थी। लेकिन जब परिवार के लोगों खासकर काकी को देखते तो भावुक हो जाते।
एक बार काकी उनसे मिलकर जाने लगी तो वे रो दिस। तब काकी ने कहा था, ''मेरा मन बोलता है कि आप एक दिन जरूर छूटेंगे। आप कानून की नजर में भले ही गुनहगार हैं, लेकिन सच पूछा जाए तो आपने एक दुष्ट का अंत करके समाज के हित में काम किया है। राम ने भी रावण को मारा था। कृण्ण ने भी कंस को मारा था। मुझे खुशी है कि बहन-बेटियों की इज्जत से खेलने वाले आदमी को आपने खत्म किया है। मुझे गर्व है कि मैं आपकी पत्नी हूं। घर को मैंने संभाल रखा है और तब तक नहीं मरूंगी, जब तक आप घर नहीं आ जाएंगे।"
समय गुजरता गया और काका बुजुर्ग होते गए। कई बीमारियों ने भी उन्हें घेर लिया। दिनोदिन उनकी हालत खराब होती जा रही थी। हालांकि जेल में उनकी सेवा हो रही थी, लेकिन कौन चौबीसों घंटे उनके पास बैठा रहता? जेल में अति बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार कैदियों को रिहा करने का प्रावधान है। उनकी रिपोर्ट बनाकर जेल के अधिकारियों ने सरकार के समक्ष पेश की तो उन्हें रिहा करने की अनुमति मिल गई।
रामशरण और जगन्नाथ की बातें सुनकर काका को अच्छा लगा।
रामशरण ने कहा, ''रामपाल, तुम आ गए, यह बड़ी ही खुशी की बात है, लेकिन दुख इसका है कि एक अच्छा काम करके तुमने सारी उमर सलाखों के पीछे गुजार दी। घर-परिवार का सुख नहीं जाना तुमने। इस देश की राजनीति बहुत बुरी है, भाई। बुरे नेताओं के कारण गुंडे-बदमाश पनप रहे हैं। अगर नेता गुंडों को संरक्षण न दें तो आम आदमी क्यों कानून हाथ में ले? गुनाह नेता और उनके पालतू गुंडे करते हैं और सजा तुम जैसे लोग भुगतते हैंं।"
रामपाल मौन थे। उनकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं, लेकिन जुबान बंद थी। तभी काकी उनकी दवा लेकर आ गई।
जगन्नाथ ने कहा, ''भाभी, खूब सेवा करो भैया की, ताकि ये ठीक हो जाएं।"
''कर तो रही हूं। भोलेनाथ ने चाहा तो जल्ही ही ये ठीक हो जाएंगे। मेरी तपस्या सच्ची होगी तो मैं एक बार इन्हें खड़ा कर दूंगी।" काकी यह कहकर काका को दवा पिलाने लगी।
-राजकुमार धर द्विवेदी
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